मुद्दा: क्या नई सरकार बनने तक बंगाल में रोजमर्रा का प्रशासन चुनाव आयोग चलाएगा?
चुनाव होने हैं, शीर्ष अधिकारियों की अग्नि-परीक्षा नहीं होनी है। अधिकारी भाजपाई या तृणमूल के बंधक नहीं होते। वे कानून और संविधान के प्रति जवाबदेह होते हैं। कोई अपवाद हो सकता है कि ‘काली भेड़’ साबित हो। उसे दंडित किया जा सकता है। उसका तबादला किसी ‘काले पानी’ की तरफ किया जा सकता है, लेकिन पश्चिम बंगाल में जिस तरह वरिष्ठ आईएएस और आईपीएस के तबादले किए गए हैं, वे न तो न्यायसंगत हैं और न ही निरपेक्ष हैं। चुनाव आयोग ने अपराह्न 4 बजे चुनावों की तारीखें घोषित की हैं और गहरी रात, अर्थात् आधी रात, में बंगाल के मुख्य सचिव, गृह सचिव, पुलिस महानिदेशक, कानून-व्यवस्था के प्रमुख, कोलकाता के पुलिस आयुक्त आदि के एक साथ तबादले कर दिए गए। हम मानते हैं कि संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को व्यापक शक्तियां देता है, लेकिन ये तबादले राजनीतिक मंशा और दुराग्रह से किए गए हैं। यह भी सर्वाेच्च अदालत का फैसला है कि ऐसे शीर्ष अधिकारियों के तबादले दो साल से पहले नहीं किए जा सकते। ये अधिकारी अपने-अपने क्षेत्र में वरिष्ठतम होते हैं और संघ लोक सेवा आयोग इनकी अनुशंसा करता है। कोई राजनीतिक बॉस इनका नियोक्ता नहीं है। सवाल यह भी है कि चुनाव आयोग को कैसे पता कि ये अधिकारी निष्पक्ष चुनाव और हिंसामुक्त माहौल में चुनाव नहीं करा सकते अथवा ये सभी अधिकारी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के वफादार हैं? आयोग ने एक ही झटके में बंगाल की शीर्ष नौकरशाही को हिला कर रख दिया। क्या रोजमर्रा का प्रशासन चुनाव आयोग चलाएगा? यदि बंगाल में प्रशासनिक बदलाव किया गया है, तो तमिलनाडु और केरलम में ऐसा क्यों नहीं किया गया? असम में दिखावे को पांच जिलों के एसएसपी बदले गए हैं। संदेह होता है कि चुनाव आयोग किसी की ‘कठपुतली’ बनकर काम कर रहा है। भारत के लिए यह विडंबना और दुर्भाग्यपूर्ण है, क्योंकि हमारा चुनाव आयोग वैश्विक स्तर पर एक उदाहरण रहा है और विभिन्न देशों के प्रतिनिधि हमारे चुनावों के दौरान ‘पर्यवेक्षक’ की भूमिका में होते हैं।
बेशक बंगाल समेत कुछ अन्य राज्यों में राजनीतिक हिंसा का पुराना इतिहास रहा है। कोई भी नौकरशाह इस राजनीतिक हिंसा को रोक नहीं सकता। चुनाव आयोग मुगालते में होगा! तमिलनाडु में भी द्रविड़ बनाम हिंदू और गैर-द्रविड़ के दरमियान उग्रता, क्रूरता के कई उदाहरण सामने आते रहे हैं। उन राज्यों के मुख्य सचिव, गृह सचिव और पुलिस महानिदेशक सरीखे शीर्षतम नौकरशाहों को क्यों नहीं बदला गया? सिर्फ इतना ही नहीं, लोकसभा चुनाव, 2024 से पहले गुजरात, उप्र, बिहार, हिमाचल, झारखंड, उत्तराखंड आदि राज्यों में सिर्फ गृह सचिव बदले गए थे। हिमाचल और झारखंड को छोड़ कर शेष राज्यों में भाजपा-एनडीए सरकार थी और आज भी है। जब महाराष्ट्र, हरियाणा, उप्र, मप्र आदि में विधानसभा चुनाव थे और विपक्षी कांग्रेस ने कुछ वरिष्ठ अधिकारियों को बदलने की मांग की थी, तो चुनाव आयोग ने खारिज क्यों कर दिया था? इन राज्यों में भी भाजपा-एनडीए सरकारें थीं और आज भी हैं। साफ लग रहा है कि चुनाव आयोग का व्यवहार पक्षपातपूर्ण रहा है। दरअसल संवैधानिक संस्था के मायने ये नहीं हैं कि आयोग निरंकुशता और स्वच्छंदता से काम करे, फैसले ले।

