मुद्दा: क्या कहती हैं स्वच्छता का राष्ट्रीय सम्मान पाने वाले शहर में दूषित पानी पीने से हुई मौतें
कितना अभिशप्त और कलंकित शहर है इंदौर! जिस शहर को स्वच्छता के लिए लगातार राष्ट्रीय सम्मान मिल रहा है, उसी शहर में लोग दूषित पानी पीने से मर रहे हैं। यह इंदौर का काला सच है! इससे विरोधाभासी त्रासदी और क्या होगी? हमें नए साल की शुरुआत में ही ऐसा शोकाकुल, संतप्त, अफसोसनाक, व्यवस्था के ‘फालतूपन’, संवेदनहीनता और मंत्री जी के ‘घंटे’ पर विश्लेषण करना पड़ रहा है, लिहाजा हमारी विवशता समझिए। यह त्रासद घटना मप्र के वरिष्ठ मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के चुनाव-क्षेत्र के भागीरथपुरा की है। क्या विडंबना और अंधेरगर्दी है कि नर्मदा के पानी की लाइन में मल की पाइपलाइन जुड़ गई और लोग वही विषाक्त पानी पीते रहे! आखिर यह नालायकी कैसे संभव है? यदि यह हत्याकांड (हम इसे हत्याकांड ही मानेंगे) सामने न आता, तो न जाने कितनी और अर्थियां उठानी पड़तीं? विषाक्त पानी पीने से अभी तक 14 मौतें हो चुकी हैं और 32 मरीजों की स्थिति गंभीर बताई गई है। उनमें से अधिकतर अस्पतालों के आईसीयू में उपचाराधीन हैं। ईश्वर उन्हें नई जिंदगी दें। अस्पतालों में 201 मरीज भर्ती हैं। कुल 8571 प्रभावित लोगों की जांच की जा चुकी है, जिनमें से 338 संक्रमित पाए गए हैं। अब हैजा फैलाने वाले घातक विषाणु भी मिले हैं। मप्र सरकार बेशक अफसरों को निलंबित करे या बर्खास्त कर दे अथवा सूली पर चढ़ा दे, लेकिन जिन परिवारों के चिराग बुझे हैं, कमाऊ पूत भरी जवानी में चले गए हैं, बड़ों के साये भी छिन गए हैं, क्या उनकी क्षतिपूर्ति संभव है? ऐसी किसी भी त्रासद घटना की क्षतिपूर्ति की ही नहीं जा सकती। जिन लोगों ने गुस्से या आक्रोश में सरकारी चेक कबूल करने से इंकार कर दिया है, हम उनकी हिम्मत की दाद देते हैं। सरकार या राजनीतिक नेतृत्व को कभी-कभार ‘लाल आंखें’ दिखाना सही होता है। कैलाश विजयवर्गीय भाजपा के वरिष्ठ नेताओं में हैं और मालवा के सबसे ताकतवर नेता के तौर पर गिने जाते हैं। उन्होंने पत्रकारों से भिड़ते हुए कहा-फोकट के सवाल मत पूछें।’’ इससे उनकी मानसिकता स्पष्ट हुई है। वह मौत के आंकड़ों को ‘घंटा’ करार दे रहे हैं। क्या ऐसे नेता को जनता को खारिज नहीं कर देना चाहिए? दरअसल सवाल खोखले नारों, दावों और सतही शंृगार का है।
इंदौर पर ग्लैमर और आकर्षण थोपा जा रहा है। वह स्वच्छता का शहर भी नहीं है। यह हमारा दावा है, क्योंकि हमने इंदौर को नंगी आंखों से देखा है। वहां अराजकता और अतिक्रमण चारों ओर देखा जा सकता है। इंदौरवाले अव्वल दर्जे के ‘खाऊ’ हैं, लेकिन नर्मदा नदी के तट पर बसे शहर में चेतावनीपूर्ण जल-संकट की स्थितियां हैं। गर्मियों में लोगों को पानी के टैंकर खरीद कर अपनी जरूरतें पूरी करनी पड़ती हैं। किसी प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मंत्री या खुद जनता ने पानी के संकट की कभी भी चिंता नहीं की। अब इंदौर को इतना विकसित बनाने की योजनाओं पर काम चल रहा है कि प्रधानमंत्री का दूसरा आवास वहीं बनाया जाएगा। प्रधानमंत्री इंदौर में बस कर क्या करेंगे? इंदौर को सिर्फ ऊपर से सजाने-संवारने की कोशिशें की जाती रही हैं। यह कैसा शहर है, जहां 95 फीसदी से अधिक दोपहिया चालक हैलमेट ही नहीं पहनते, लाल बत्ती की गंभीरता से नहीं मानते और वाहन आपस में लगभग काटते, टकराते चलते रहते हैं। ऐसे शहर को बेनकाब करना जरूरी है। हत्याकांड के बाद जिन सैंपलों की रपटें सार्वजनिक हो चुकी हैं, उनमें फीकल कॉलिफार्म, ई-कोलाई, विब्रियो, क्लेबसेला और प्रोटोजोआ सरीखे खतरनाक और जानलेवा बैक्टीरिया पाए गए हैं। फिर लोग कैसे बचेंगे? अब पानी की आपूर्ति की लाइनों को साफ किया जा रहा है। मप्र उच्च न्यायालय ने सख्ती बरतते हुए सरकार से दो दिन में ही स्टेटस रपट मांगी है और बीमार लोगों का मुफ्त इलाज करने के निर्देश दिए हैं। सवाल नगर निगम की अंदरूनी व्यवस्था का है। यह पाइपलाइन बदली जानी थी, लोग शिकायतें कर रहे थे, टेंडर भी आमंत्रित कर लिए गए थे, उसके बावजूद व्यवस्था निकम्मी रही और इन मौतों का इंतजार करती रही! अफसरों का निलंबन या बर्खास्तगी ही पर्याप्त नहीं है।

