परंपरा: हुड़के की थाप से गूंजते थे खेत, अब खामोश होती जा रही है कुमाऊँ की ‘हुड़किया बौल’ परंपरा  

परंपरा: हुड़के की थाप से गूंजते थे खेत, अब खामोश होती जा रही है कुमाऊँ की ‘हुड़किया बौल’ परंपरा  
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बागेश्वर।  उत्तराखंड के कुमाऊँ अंचल में इन दिनों धान की रोपाई का मौसम अपने चरम पर है। पहाड़ों पर बरसात की फुहारों के बीच सीढ़ीनुमा खेतों में धान की पौध रोपती महिलाओं की तस्वीरें आज भी ग्रामीण जीवन की सुंदरता को जीवंत करती हैं। लेकिन इस दृश्य का एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक पक्ष, जो कभी इन खेतों की पहचान हुआ करता था, अब धीरे-धीरे स्मृतियों में सिमटता जा रहा है। यह परंपरा है ‘हुड़किया बौल’ की, जिसने सदियों तक कुमाऊँ की कृषि संस्कृति, लोककला और सामाजिक एकता को जीवित रखा।
एक समय था जब धान की रोपाई केवल कृषि कार्य नहीं, बल्कि पूरे गांव का सामूहिक उत्सव हुआ करती थी। आज से दस-पंद्रह वर्ष पहले तक अधिकांश गांवों में रोपाई का स्वरूप बिल्कुल अलग था। पूरे गांव में एक समय पर केवल एक ही परिवार के खेतों में रोपाई होती थी। कृषि भूमि अधिक थी और काम भी बड़ा होता था, इसलिए गांव के सभी लोग मिलकर एक-दूसरे के खेतों में श्रमदान करते थे। खेतों में महिलाओं की लंबी कतारें होती थीं और उनके बीच खड़ा एक लोकगायक अपने हाथ में हुड़का लेकर मधुर स्वर में हुड़किया बौल गाता था।
हुड़का, कुमाऊँ का एक पारंपरिक वाद्ययंत्र है, जिसकी थाप खेतों और घाटियों में दूर तक गूंजती थी। हुड़किया द्वारा गाए जाने वाले गीतों में प्रकृति, ऋतु परिवर्तन, लोकदेवताओं, प्रेम, विरह और ग्रामीण जीवन की अनेक भावनाएं समाहित होती थीं। महिलाएं उन्हीं गीतों की लय पर रोपाई करती थीं। गीत-संगीत के इस वातावरण में न थकान का एहसास होता था और न ही समय का पता चलता था। कठिन से कठिन श्रम भी उत्सव जैसा प्रतीत होता था और रोपाई का कार्य समय पर पूर्ण हो जाता था।
उस दौर की सबसे बड़ी विशेषता केवल सामूहिक श्रम नहीं, बल्कि सामाजिक आत्मीयता थी। जिस परिवार के खेत में रोपाई होती थी, उस दिन पूरे गांव के लोग सुबह का नाश्ता और दोपहर का भोजन उसी परिवार के घर पर करते थे। घर-आंगन लोगों से भरे रहते थे, बच्चों की चहल-पहल होती थी और बुजुर्गों की मौजूदगी पूरे वातावरण को पारिवारिक बना देती थी। यह परंपरा केवल खेती तक सीमित नहीं थी, बल्कि आपसी प्रेम, सहयोग, भाईचारे और सामाजिक एकता को मजबूत करने का माध्यम भी थी।
लोकसंस्कृति के जानकार मानते हैं कि हुड़किया बौल केवल गीतों का संग्रह नहीं, बल्कि पहाड़ के जनजीवन का जीवंत दस्तावेज है। इन गीतों में उस समय की सामाजिक परिस्थितियां, लोकविश्वास, धार्मिक आस्थाएं और ग्रामीण समाज की संवेदनाएं सुरक्षित हैं। यही कारण है कि इन्हें कुमाऊँ की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर माना जाता है।
लेकिन समय के साथ यह तस्वीर तेजी से बदल गई है। भूमि बंटवारे के कारण खेत छोटे हो गए हैं और अब एक ही दिन में कई परिवारों की रोपाई होने लगी है। पहले जहां पूरा गांव एक परिवार के खेत में जुटता था, वहीं आज लोग अपने-अपने खेतों के कार्यों में इतने व्यस्त हैं कि कई बार स्वयं भी समय पर भोजन नहीं कर पाते। सामूहिक श्रम की परंपरा कमजोर पड़ गई है और उसके साथ ही हुड़किया बौल की मधुर स्वर लहरियां भी खेतों से लगभग गायब हो गई हैं।
आधुनिक जीवनशैली, ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन, कृषि पद्धतियों में बदलाव और बदलती सामाजिक संरचना ने इस लोक परंपरा को गहरा आघात पहुंचाया है। आज नई पीढ़ी के अनेक युवाओं ने न तो हुड़किया बौल को खेतों में सुना है और न ही उस सामूहिकता को महसूस किया है, जो कभी गांवों की पहचान हुआ करती थी। जहां कभी हुड़के की थाप और लोकगीतों की गूंज सुनाई देती थी, वहां अब मशीनों, मोबाइल फोन और भागदौड़ भरी जिंदगी का शोर अधिक सुनाई देता है।
वास्तव में, हुड़किया बौल केवल खेती का एक तरीका नहीं था। यह लोककला, संगीत, सामुदायिक जीवन और सांस्कृतिक मूल्यों का संगम था। यह परंपरा लोगों को जोड़ती थी, श्रम को उत्सव में बदल देती थी और गांवों को एक परिवार की तरह बांधे रखती थी। आज जब सामाजिक संबंधों में दूरी बढ़ रही है और पारंपरिक लोककलाएं अस्तित्व के संकट से जूझ रही हैं, तब इस विरासत को संरक्षित करना और नई पीढ़ी तक पहुंचाना पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है।
कुमाऊँ के खेत आज भी धान की हरियाली से लहलहा रहे हैं, लेकिन उन खेतों में गूंजने वाले लोकस्वरों की कमी स्पष्ट महसूस की जा सकती है। आवश्यकता इस बात की है कि विद्यालयों, सांस्कृतिक संस्थाओं, लोकमहोत्सवों और ग्रामीण आयोजनों के माध्यम से हुड़किया बौल जैसी परंपराओं को पुनर्जीवित किया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी जड़ों और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी रह सकें।
जहां कभी हुड़के की थाप पर श्रम गीतों की स्वर लहरियां गूंजती थीं, वहां आज आधुनिक जीवन की आपाधापी ने जगह ले ली है। फिर भी यदि समाज चाहे, तो इस अमूल्य लोकधरोहर को पुनः जीवन दिया जा सकता है। क्योंकि संस्कृति केवल अतीत की स्मृति नहीं होती, वह भविष्य की पहचान भी होती है।

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