पड़ोस: नेपाल में घट रही घटनाओं से सतर्क होने की जरूरत है

पड़ोस: नेपाल में घट रही घटनाओं से सतर्क होने की जरूरत है
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अनिल शर्मा
भारत के पड़ोसी देश नेपाल में राजशाही को बहाल करने की मांग को लेकर,  जो भारी बवाल मचा हुआ है, उससे भारत को सतर्क रहना होगा। इसका कारण नेपाल की घटनाएं भारत पर भी असर डाल सकती हैं।  इसमें कोई शक नहीं कि नेपाल की मौजूदा  केपी शर्मा ओली सरकार का झुकाव पूरी तरह से चीन की ओर है।  यह भी छिपा हुआ तथ्य नहीं है कि चीन लंबे समय से अरुणाचल प्रदेश और भारत के जिस हिस्से पर दावा कर रहा है वो सब नेपाल की सीमा से सटे हुए राज्य हैं।  इसलिए भारत नेपाल की घटनाओं को आंख मूंदकर नहीं देख सकता।  फिलहाल भारत ने वेट एंड वॉच की नीति अपनाई है।  जो सही भी है।  वैसे भी पंडित जवाहरलाल नेहरू के समय से भारत की नीति यही है कि किसी भी संप्रभु देश में किसी अन्य देश को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।  बहरहाल,बीते कई दिनों से काठमांडू में सुरक्षाकर्मियों और राजशाही समर्थक कार्यकर्ताओं के बीच हिंसक झड़पें  हो रही हैं।  इस दौरान दो बार कर्फ्यू भी लगाना पड़ा था। इन घटनाओं के बाद से नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और नेपाल के पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र शाह आमने-सामने  आ गए हैं। दरअसल, साल 1768 में गोरखा राजा पृथ्वी नारायण शाह ने कई रजवाड़ों को एक साथ लाकर नेपाल की नींव रखी थी।  इसके बाद उन्होंने भदगांव, काठमांडू और पाटन पर जीत हासिल की और नेपाल का एकीकरण किया।  नेपाल की पहचान एक हिंदू राष्ट्र के तौर पर थी।   लगभग 240 वर्षों तक राजशाही जारी रही।  लगभग 18 वर्ष चले लंबे संघर्ष के बाद साल 2008 में नेपाल के राजनीतिक दलों ने संसद की घोषणा के माध्यम से राजशाही को खत्म कर दिया था।
इसके बाद नेपाल को हिंदू राष्ट्र के बजाय एक धर्मनिरपेक्ष, संघीय, लोकतांत्रिक गणराज्य में बदल दिया गया था।  वस्तुत: नेपाल में लोकतंत्र के लिए पहला आंदोलन 1950 के दशक में हुआ।  इसके बाद देश में नया संविधान बनाकर चुनाव भी हुए।  हालांकि, इसके कुछ ही समय बाद नेपाल के तत्कालीन राजा महेंद्र ने संसद को भंग कर के लोकतांत्रिक सरकार को हटा दिया।  इसके बाद 1990 के दशक में नेपाल में लोकतंत्र के लिए एक और आंदोलन हुआ। तब तत्कालीन राजा बीरेंद्र ने संविधान में सुधारों को स्वीकार कर लिया।  इसके बाद एक बहुदलीय संसद की स्थापना हुई।  साल 2008 में एक शांति समझौता हुआ और नेपाल में 240 साल पुरानी राजशाही का अंत हो गया। बहरहाल, नेपाल के पूर्व पूर्व नरेश ज्ञानेन्द्र शाह ने फरवरी में लोकतंत्र दिवस पर कहा था कि अब समय आ गया है जब हमें देश की सुरक्षा और एकता के लिए जिम्मेदारी लेनी चाहिए। इसके बाद से ही राजतंत्र के समर्थक पूरे देश में सक्रिय हो गए हैं। पूर्व राजा के समर्थक गत कई दिनों से काठमांडू और पोखरा सहित देश के विभिन्न हिस्सों में रैलियां निकाल रहे हैं और राजशाही को पुन: बहरहाल करने की मांग कर रहे हैं।  दरअसल, नेपाल में राजशाही की मांग करने वाले  संगठनों ने देश के राजनीतिक दलों पर भ्रष्टाचार में डूबने का आरोप लगाया है।  इसके अलावा इन पर दूसरे धर्मों को बढ़ावा देने के भी आरोप लग रहे हैं।  देश की आर्थिक स्थिति बिगड़ी हुई है और बेरोजगारी भी बढ़ रही है।  राजशाही के खत्म होने के बाद नेपाल में कभी राजनीतिक तौर पर स्थिरता नहीं रही।  देश में 16 सालों में 13 सरकारें बनी हैं।
दरअसल भ्रष्टाचार और राजनीतिक अस्थिरता से नेपाल की जनता तंग आ चुकी है। इसी वजह से राजशाही की मांग की जा रही है।  हालांकि आधुनिक विश्व में किसी देश के लिए लोकतंत्र से पीछे हटना लगभग असंभव काम है, लेकिन इतना तय है कि मौजूदा ओली सरकार को नेपाल को कल्याणकारी लोकतांत्रिक राज्य में बदलना होगा।  वहां वामपंथ के लिए अब जगह नहीं बची है।  जहां तक भारत का सवाल है तो उसे सतर्क रहना होगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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