नज़रिया: रेवड़ियां बांटने वालों से हासिल करने वाले ज्यादा दोषी
ओमप्रकाश मेहता
भारतीय राजनीति में रेवडिय़ों को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने चिंता व्यक्त करते हुए इस प्रक्रिया को प्रजातंत्र के लिए काफी आत्मघाती कदम बताया है। अब इसे प्रजातंत्र पद्धति में व्याप्त दोष कहा जाए या और कुछ ?
किंतु मेरी नजर में तो देश विरोधी सिलसिला है जिसके लिए रेवडिय़ां बांटने वाले कम उसे हासिल करने वाले ज्यादा दोषी है।
क्या हमारा स्तर इतना गिर चुका है कि आजादी की हीरक जयंती तक हम अज्ञानी और भिखारी बने हुए और थोड़े से लालच में अयोग्य और अवसरवादियों के हाथों में देश का भविष्य सौंप रहे हैं।
हमारे राजनेताओं की तो यह एक सोची समझी चाल है, जिसके तहत वे भारतवासियों को हमेशा लाचार और दया का पात्र बनाकर रखना चाहते हैं तथा समय आने पर उसकी मजबूरी का राजनीतिक फायदा उठाते रहते हैं। वह नहीं चाहते कि देश का आम मतदाता अपनी ज़रूरतें पूरी करने में पूर्णता सक्षम हो।
अब सर्वोच्च न्यायालय की कड़ी टिप्पणी को कितने लोग समझ पा रहे हैं या जानबूझकर समझना नहीं चाहते हैं यह एक अलग बात है, किंतु इस मामले में सुप्रीमकोर्ट की चिंता एकदम सही है।
अब तो हमारे प्रजातंत्र का यह आम चलन ही हो गया है कि देश के लोगों को कभी भी आत्मनिर्भर व चिंता मुक्त मत होने दो तथा इन्हें हर तरीके से इतना परेशान करके रखो कि आम आदमी उनकी शरण में आने को मजबूर हो जाए और वह उसकी आड़ में अपनी राजनीतिक स्वार्थ सिद्धि कर लें।
पहले तो सिर्फ चुनाव के समय ही रेवड़ियों का पिटारा खोलने का चलन था पर अब तो यह पिटारे कभी भी खोले जाने लगे हैं और राजनीतिक स्वार्थसिद्धि चुनावों की तरह 12 मास जारी रहती है।
यही नहीं, इन पर अंकुश तो राजनेता अपने स्वार्थ वश लगा नहीं रहे हैं, और सरकारें भी इस दिशा में मौन दर्शक बनी हुई हैं। अब ऐसी स्थिति में न्यायपालिका ही है जिसने अपना मौन तोड़ा है और वह अब इस दिशा में भी सक्रिय नजर आ रही है।
यहां अहम सवाल यह पैदा होता है कि आजादी के 75 साल के बाद भी आम नागरिक आज याचक क्यों बना हुआ है? इतनी लंबी अवधि में वह हर दृष्टि से आत्मनिर्भर क्यों नहीं बन पाया?
वास्तविकता यह है कि हमारे राजनेताओं ने ही आम आदमी को आत्मनिर्भर नहीं बनने दिया। हर सुविधा आम आदमी को मुफ्त में मुहैया करा कर उसे आलसी बना दिया।
जीवन की हर सुविधा यदि मुफ्त में मिल जाए तो फिर भला मेहनत करना कौन पसंद करेगा? यही स्थिति आज भारत में आम आदमी की है। और आम आदमी का हाल यह है कि आजादी के इतने लंबे अंतराल के बाद भी वह लाचार और बेबस बना हुआ है, जिसका फायदा राजनीतिक दल उठा रहे हैं और सही तो यही है कि जब तक आम आदमी स्वयं को लेकर सक्रिय नहीं होगा, तब तक देश में यही सब चलता रहेगा। फिर देश चाहे किसी भी दिशा में क्यों न जाए और इसीलिए आज जो चिंता आम आदमी को करनी चहिए, वह सर्वोच्च न्यायालय कर रहा है।
अब इस सब के बाद भी हम यदि नहीं जागे तो फिर हमारे दुर्भाग्य के लिए और कोई नहीं हम स्वयं ही दोषी होंगे और यदि यही आगे भी चलता रहा तो हम भारतवासी फिर से अपनों के ही अधीन होकर परतंत्र की जिंदगी गुजारेंगे और देश में लूटमार जारी रहेगी और इसका भविष्य अंधकार में हो जाएगा।
(ये लेखक के निजी विचार हैं)

