ज्वलंत सवाल: उत्तराखंड में बारिश से तबाही, आखिर कब बदलेगी तस्वीर?

ज्वलंत सवाल: उत्तराखंड में बारिश से तबाही, आखिर कब बदलेगी तस्वीर?
Spread the love

सड़कें बह रहीं, पुल टूट रहे, गांव कट रहे… मानसून आते ही विकास पर उठने लगते हैं सवाल

विजय रावत
उत्तराखंड में मानसून एक बार फिर आफत बनकर बरस रहा है। लगातार हो रही भारी बारिश ने पर्वतीय और मैदानी दोनों क्षेत्रों में जनजीवन को प्रभावित किया है। कहीं भूस्खलन से सड़कें बंद हैं, कहीं पुल क्षतिग्रस्त हो गए हैं तो कहीं उफनाती नदियां और गदेरे लोगों के लिए खतरा बने हुए हैं। कई गांवों का संपर्क जिला मुख्यालयों से टूट चुका है, जबकि चारधाम यात्रा मार्ग भी बार-बार बाधित हो रहे हैं।
प्रदेश में लगभग हर वर्ष मानसून के दौरान ऐसी ही तस्वीर सामने आती है। सड़कें धंस जाती हैं, पहाड़ दरक जाते हैं, बिजली और पेयजल योजनाएं प्रभावित होती हैं और हजारों लोगों का सामान्य जीवन पटरी से उतर जाता है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि वर्षों से दोहराई जा रही इस समस्या का स्थायी समाधान आखिर क्यों नहीं निकल पा रहा है?
विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियां चुनौतीपूर्ण हैं और अत्यधिक वर्षा के कारण आपदाओं का जोखिम बना रहता है। वहीं, स्थानीय लोगों का कहना है कि आपदा के बाद राहत और मरम्मत के कार्य तो होते हैं, लेकिन दीर्घकालिक और टिकाऊ समाधान पर अपेक्षित गति से काम नहीं हो पाता। हर वर्ष सड़क, पुल और अन्य आधारभूत ढांचे के निर्माण तथा मरम्मत पर बड़ी राशि खर्च की जाती है। इसके बावजूद कई स्थानों पर पहली ही तेज बारिश में सड़कें क्षतिग्रस्त होने और पुलों के बहने की घटनाएं सामने आती हैं। इससे विकास कार्यों की गुणवत्ता, रखरखाव और दीर्घकालिक योजना को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। राज्य सरकार का कहना है कि प्रभावित क्षेत्रों में राहत एवं बचाव कार्य युद्धस्तर पर जारी हैं। बंद सड़कों को खोलने, बिजली और पेयजल आपूर्ति बहाल करने तथा प्रभावित परिवारों तक सहायता पहुंचाने के लिए प्रशासन और आपदा प्रबंधन की टीमें लगातार कार्य कर रही हैं। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल राहत और पुनर्निर्माण पर्याप्त नहीं होगा। संवेदनशील क्षेत्रों की वैज्ञानिक मैपिंग, भूस्खलन प्रभावित ढलानों का उपचार, बेहतर जल निकासी व्यवस्था, पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप निर्माण और आपदा-रोधी आधारभूत ढांचे के विकास पर लगातार निवेश ही भविष्य में नुकसान को कम कर सकता है।
उत्तराखंड जैसे संवेदनशील हिमालयी राज्य में मानसून प्राकृतिक चुनौती है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि बेहतर योजना, मजबूत आधारभूत ढांचा और समयबद्ध क्रियान्वयन से इसके प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है। जनता की अपेक्षा है कि हर वर्ष राहत और पुनर्निर्माण के चक्र से आगे बढ़कर स्थायी समाधान की दिशा में ठोस और प्रभावी कदम उठाए जाएं।

जनता के मन में उठ रहे सवाल
हर साल एक जैसी तबाही के बावजूद स्थायी समाधान क्यों नहीं?
क्या संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण कार्य वैज्ञानिक मानकों के अनुरूप हो रहे हैं?
आपदा प्रबंधन में दीर्घकालिक रणनीति कब पूरी तरह जमीन पर दिखाई देगी?

क्या विकास योजनाओं की नियमित गुणवत्ता जांच पर्याप्त है?

Parvatanchal