चिंतन: देश में धार्मिक उन्माद की घटनायें बढ़ना चिंता की बात
रानू राजपूत
हमारे देश में लगातार धार्मिक उन्माद की घटनाएं बढ़ रही हैं। औरंगजेब की कब्र को हटाने को लेकर महाराष्ट्र के नागपुर सहित कुछ शहरों में उपद्रव हुए। इसके पहले इंदौर जिले के महू में 9 मार्च को भारत के क्रिकेट में जीत के उपलक्ष में निकाले जा रहे जुलूस पर कथित तौर पर पथराव की घटना हुई। होली पर भी उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में हिंसक घटनाएं हुई हैं। इधर सोमवार को दिल्ली के जंतर मंतर में वक्फ बोर्ड संशोधन विधेयक के खिलाफ ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने धरना दिया, जिसमें कुछ मौलानाओं ने विधेयक संसद में पेश होने पर देश में आग लगाने की धमकियां दीं। असदुद्दीन ओवेसी, इमरान मसूद, अबू आजमी, टी राजा, नीतेश राणे, गिरिराज किशोर जैसे नेता लगातार सांप्रदायिक आधार पर बयानबाजी करते रहते हैं। जाहिर है देश में धार्मिक उन्माद बढ़ रहा है। इसमें कोई शक नहीं कि भारत में औरंगजेब को क्रूर और अत्याचारी शासक माना गया है। हमारे मुसलमान भाई भी खुद को औरंगजेब से नहीं जोड़ते। यही वजह है कि भारतीय मुसलमान अपने बच्चों का नाम औरंगजेब पर नहीं रखते। औरंगजेब की मजार 1707 में निर्मित की गई। इस कब्र को हटाने की या तोड़ने की मांग करना ठीक नहीं है। इसी तरह 300 वर्ष पूर्व किसी मुगल शासक द्वारा किए गए अत्याचार का बदला आज की पीढ़ी से नहीं लिया जा सकता। यह सब बंद होना चाहिए। ऐसा लगता है नियोजित तरीके से उन्माद भड़काया जा रहा है। केंद्र और संबंधित राज्य सरकारों को इस मामले में कड़े कदम उठाने होंगे। आमतौर पर भारतीय मानस सहिष्णु और सहनशील होता है। इसलिए धर्म के आधार पर सियासत बंद होनी चाहिए। विवादास्पद बयान बाजी या हेट स्पीच देने वाले नेताओं पर तुरंत और कड़ी कार्रवाई होना जरुरी है। देश इस तरह का सांप्रदायिक तनाव बर्दाश्त नहीं कर सकता। सभी को यह समझना होगा कि धार्मिक सहिष्णुता और मेल-मिलाप की भावना कई समस्याओं का अचूक समाधान है। यह भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है। दुनियाभर में व्याप्त उग्रवाद, हिंसा और विघटन जैसी समस्याओं का समाधान धार्मिक सहिष्णुता के जरिये हो सकता है। धर्म जीवन जीने का तरीका सिखाता है। वहीं उच्चस्तरीय मूल्यों की समझ और सद्भाव को पैदा करता है। ऐसे में अगर सभी धर्मों के प्रति मन में सद्भाव हो तो दुनिया के लिए चुनौती बनने वाली समस्याओं का समाधान संभव हो जाएगा। साथ ही जीवन मूल्यों के प्रति आदर का संचार होगा। दरअसल, धर्म जीवन शैली का सबसे बड़ा मार्गदर्शक है, लेकिन इसे सामाजिक दुर्भाग्य ही कहेंगे कि आज धर्म और उसके प्रति सम्मान के भाव बढ़ाने वाले तत्वों से ज्यादा धार्मिक उन्माद की स्थिति पैदा करने वालों की संख्या अधिक है। सामाजिक विविधता की कसौटी पर देखें तो भारत दुनिया के उन गिने-चुने देशों में है जहां अलग-अलग धर्मों और मतों को मानने वाले समूहों या समुदायों को पूरी आजादी है। देश का संविधान यहां के सभी नागरिकों को अपनी आस्था के निर्वाह का अधिकार और गारंटी देता है। भारत ने लंबे समय तक आतंकवाद का दंश झेला है। 5 वर्ष पूर्व हुई कोरोना महामारी के बाद बड़ी मुश्किल से हमारा देश आर्थिक विकास की पटरी पर लौटा है। ऐसे में हम किसी भी प्रकार की अस्थिरता और अशांति बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं हैं। जाहिर है केंद्र और राज्य सरकारों के साथ-साथ देश की जनता को भी इस मामले में सजग होना पड़ेगा। हमें आपसी सद्भाव और भाईचारा बना कर रखना पड़ेगा जिससे आतंकियों और देश विरोधी संगठनों के नापाक मंसूबे विफल हो जाएं। शांति भंग करने वाले सभी तत्वों से सरकारों को कड़ाई से निपटना होगा।
(ये लेखक के निजी विचार हैं)

