आकलन: राहुल गांधी को प्रादेशिक क्षत्रपों पर से निर्भरता कम करनी होगी

आकलन: राहुल गांधी को प्रादेशिक क्षत्रपों पर से निर्भरता कम करनी होगी
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अजीत द्विवेदी
लोकसभा चुनाव, 2024 में कांग्रेस की बढ़ी ताकत का इस्तेमाल क्या राहुल गांधी पार्टी को मजबूत करने और स्वतंत्र व बेलगाम क्षत्रपों को काबू करने के लिए करेंगे? यह लाख टके का सवाल है। हकीकत यह है कि लोकसभा चुनाव, 2024 से पहले तक कांग्रेस के प्रादेशिक क्षत्रप लगभग मनमाना आचरण कर रहे थे। आलाकमान यानी सोनिया और राहुल गांधी के लिए उनको निर्देश देना असंभव सा काम था। क्षत्रप आलाकमान का नाम लेते थे और उनके प्रति सार्वजनिक रूप से सम्मान भी जाहिर करते थे लेकिन करते अपने मन की थे। अगर कभी कांग्रेस आलाकमान को उनके खिलाफ कोई कदम उठाना पड़ा तब या तो कामयाबी नहीं मिली या जिसके खिलाफ कदम उठाया उसने पार्टी छोड़ दी।
कांग्रेस आलाकमान के साथ वही रहा, जिसकी सत्ता को नेहरू गांधी परिवार ने चुनौती नहीं दी। कैप्टेन अमरिंदर सिंह को हटाया या गुलाम नबी आजाद को राज्यसभी नहीं मिली तो वे पार्टी छोड़ गए। असम में तरुण गोगोई को 15 साल तक, दिल्ली में शीला दीक्षित को 15 साल तक, हरियाणा में भूपेंद्र सिंह हुड्डा को 10 साल तक सीएम बनाए रखा गया तो ये सब लोग कांग्रेस के साथ रहे। लेकिन अंत नतीजा यह हुआ कि इन राज्यों में कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई तो एक दशक के बाद भी इन राज्यों में कांग्रेस के लिए सत्ता में वापसी मुश्किल या नामुमिकन दिख रही है।


असल में सोनिया और राहुल के दौर में पिछले ढाई दशक में कांग्रेस का शक्ति संतुलन लगभग पूरी तरह से बदल गया था। राजीव गांधी के समय तक सत्ता का केंद्र दिल्ली होती थी। सोनिया गांधी के कांग्रेस की कमान संभालने के बाद इसकी संरचना में बदलाव आने लगा और एक दशक में यह दिल्ली से शिफ्ट होकर अलग अलग राज्यों में पहुंच गया। आलाकमान या नेहरू गांधी परिवार कांग्रेस की सत्ता का केंद्र तो बना रहा लेकिन उसकी ताकत आभासी रह गई। उसे राज्यों के क्षत्रपों से रोशनी और ताकत दोनों लेनी होती थी।
आंध्र प्रदेश में वाईएसआर रेड्डी, हरियाणा में भूपेंद्र सिंह हुड्डा, मध्य प्रदेश में कमलनाथ, असम में तरुण गोगोई, दिल्ली में शीला दीक्षित, पंजाब में कैप्टेन अमरिंदर सिंह, राजस्थान में अशोक गहलोत, छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल, हिमाचल प्रदेश में वीरभद्र सिंह से कांग्रेस आलाकमान को थोड़ी थोड़ी शक्ति मिलती थी। ये सब नेहरू गांधी परिवार के नाम की कसमें खाते थे लेकिन उनके कंट्रोल में नहीं थे। इनमें से किसी को हटाने की हैसियत कांग्रेस आलाकमान की नहीं थी। इन क्षत्रपों ने राज्य की राजनीति में अपना एकाधिकार बना लिया था, पार्टी के दूसरे नेताओं की अनदेखी करते थे और पार्टी कमजोर हो रही थी इसके बावजूद सोनिया और राहुल गांधी कार्रवाई करने की स्थिति में नहीं थे।


कह सकते हैं कि 2014 के बाद से सिर झुका कर किसी क्षत्रप ने कांग्रेस आलाकमान की बात नहीं मानी। जिसको आलाकमान ने आंख दिखाई उसने पार्टी छोड़ दी या पलट कर उससे ज्यादा लाल आंख दिखा दी। आलाकमान ने जिसको बनाए रखा वे मनमानी करते रहे और पार्टी डूबो दी। दिलचस्प बात यह है कि इनमें से ज्यादातर क्षत्रप 1998 के बाद से सोनिया गांधी द्वारा बनाए गए थे। अब स्थितियां बदली हैं। लगातार दो बार बुरी तरह से हारने के बाद कांग्रेस को 99 सीट की संजीवनी मिली है। राहुल गांधी की छवि बेहतर हुई है और दो भारत जोड़ो यात्राओं की वजह से उनके नेतृत्व के प्रति कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों की आस्था बनी है। राहुल गांधी अपनी इस हैसियत का क्या इस्तेमाल करते हैं, इस पर कांग्रेस का भविष्य निर्भर करेगा। अगर वे अपनी निर्विवाद हैसियत का फायदा उठा कर क्षत्रपों को नियंत्रित करते हैं और संगठन को मजबूत बनाते हैं तो कांग्रेस के लिए आगे का रास्ता सुगम हो सकता है।
इसके लिए सबसे पहले राहुल गांधी को प्रादेशिक क्षत्रपों पर से निर्भरता कम करनी होगी। प्रदेश की राजनीति को सीधे संचालित करना होगा, जो कांग्रेस का पुराना मॉडल था। यह काम प्रभारी महासचिवों के जरिए होता था। जब दिल्ली में आलाकमान की ताकत कम हुई थी तो उसके द्वारा नियुक्त किए गए प्रभारियों की भी कोई हैसियत नहीं रह गई थी। प्रभारी राज्यों में जाकर वहां के प्रादेशिक क्षत्रपों के हिसाब से काम करते थे। कई बार तो ऐसा होता था कि प्रादेशिक क्षत्रपों की मर्जी से या उनकी पसंद से प्रभारी नियुक्त होते थे।
(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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