मुद्दा: एक या दो चरणों में मतदान कराने की शुरुआत बिहार से होनी चाहिए

मुद्दा: एक या दो चरणों में मतदान कराने की शुरुआत बिहार से होनी चाहिए
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ई चरणों में मतदान आम चलन बना हुआ है। मगर साथ ही यह धारणा भी मज़बूत हुई है कि इस तरह चुनाव को अत्यधिक खर्चीला बनाया गया है, जिससे कम संसाधन वाले दलों के लिए प्रतिकूल स्थितियां बनी हैं।
बिहार के राजनीतिक दलों में बनी यह सहमति महत्त्वपूर्ण है कि विधानसभा चुनाव के लिए मतदान एक या अधिक से अधिक दो चरणों में कराया जाना चाहिए। निर्वाचन आयुक्तों के साथ बैठक में इन दलों ने यह राय दो-टूक लहज़े में बताई। उनका यह तर्क ग़ौरतलब है कि राज्य में न तो कानून-व्यवस्था की कोई समस्या है और न ही अब पहले जैसे नक्सल-ग्रस्त इलाक़े हैं, जिन्हें तर्क बनाकर अनेक चरणों में मतदान कराने की शुरुआत की गई थी। हालाँकि 1990 के दशक में जब यह शुरुआत हुई, तब भी इसके पीछे की मंशा पर सवाल उठे थे, लेकिन तब प्रभु वर्ग में बिहार और पश्चिम बंगाल को लेकर एक खास तरह का प्रतिक्रिया भाव था, जिससे आयोग इस योजना को अमली जामा पहना सका।
कई चरणों में मतदान धीरे-धीरे देश के अनेक हिस्सों में आम चलन बन गया। मगर साथ ही यह धारणा भी मज़बूत हुई है कि इस तरह चुनाव को अत्यधिक खर्चीला बनाया गया है, जिससे कम संसाधन वाले दलों के लिए प्रतिकूल स्थितियां बनी हैं, जबकि यह सत्ताधारी दलों के अनुकूल रहा है। अच्छी बात है कि केंद्र में सत्ताधारी गठबंधन में शामिल दलों की बिहार की इकाइयों ने भी निर्वाचन आयोग के सामने कहा कि एक या दो चरणों में चुनाव करवाकर दलों एवं उम्मीदवारों को अतिरिक्त खर्च के बोझ से बचाया जा सकता है। खर्च के अलावा हाल में एक दूसरी समस्या भी खड़ी हुई है।
इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) के रख-रखाव और उस दौरान कथित हेरफेर की शिकायतों का फैलना अब हर चुनाव की कहानी बन गया है। इस संबंध में मतदान से लेकर मतगणना के दिन तक सोशल मीडिया पर तरह-तरह की चर्चाएं छाई रहती हैं। इसका भी समाधान मतदान के बाद यथाशीघ्र गणना ही है। वैसे भी वोट डालने के बाद हफ्तों या कई बार महीने भर से भी ज़्यादा तक परिणाम का इंतज़ार करना विसंगति भरा एहसास देता है। इसलिए बिहार के दलों ने जो कहा है, निर्वाचन आयोग को अवश्य ही उसके अनुरूप चुनाव कार्यक्रम घोषित करना चाहिए। इससे एक नई शुरुआत होगी, जिसे देश भर में अपनाया जा सकेगा।

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