पड़ताल: क्या संघ नेतृत्व और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच सच में कुछ मतभेद हैं ?

पड़ताल: क्या संघ नेतृत्व और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच सच में कुछ मतभेद हैं ?
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अजय दीक्षित
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आजकल कुछ संयत और चुप से हैं, विशेषकर भारतीय जनता पार्टी के मामलों को लेकर वे अटल बिहारी वाजपेई की राह पर चल पड़े हैं जब संघ प्रमुख स्व कुप्प सी सुदर्शन से उनके तत्कालीन सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्र को लेकर मतभेद हो गया था।अबकी बार भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष को लेकर मतभेद उभर कर सामने आए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और संघ प्रमुख मोहन भागवत हम उम्र हो कर एक साथ प्रचारक बने हैं। नरेंद्र मोदी
1977 में विभाग प्रचारक हो गए थे। उसके बाद उन्हें जनसंघ में अहमदाबाद संगठन मंत्री बना दिया। मोहन भागवत ने राजनीति में जाने का प्रयास नहीं किया। मोहन भागवत ने ही संघ प्रमुख के रूप में तत्कालीन भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह को 2013 में गोवा अधिवेशन में 2014 में होने वाले लोकसभा चुनावों के लिए प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को घोषित कर ने का आदेश दिया।
हालांकि संघ के प्रमुख पदाधिकारी 2007 में मुख्यमंत्री रहते नरेंद मोदी से खुश नहीं थे क्योंकि गुजरात के मुख्यमंत्री रहते नरेंद्र मोदी बेलगाम थे। लेकिन मोहन भागवत के संघ प्रमुख बनने के बाद वे संघ की पसंद बने ।
संघ और भाजपा के रिश्तों पर नजर रखने वाले अरुण शौरी ने एक बार इंडियन एक्सप्रेस में 1999 में एक लेख लिखा था कि संघ अटल बिहारी वाजपेई से खुश नहीं हैं लेकिन संघ के समक्ष कोई रास्ता भी नहीं है क्योंकि तब अटल बिहारी वाजपेई प्रधानमंत्री थे और वे कतई संघ के न तो पसंद थे न ही वह संघ के राम मंदिर, अनुच्छेद 370, कॉमन सिविल कोड की दिशा में कोई काम कर रहे थे बल्कि उन्होंने तो बकायदा सार्वजनिक रूप से कहा था कि वे एनडीए के प्रधानमंत्री मंत्री हैं। नरेंद्र मोदी ने भी अब अटलजी की राह पकड़ली है हालांकि 2024 से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संघ के प्रिय थे लेकिन 2024 में जैसे ही भारतीय जनता पार्टी की सीटे 303 से घटकर 240 पर आई वैसे ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ प्रमुख ने आपदा में अवसर ढूंढना शुरू कर दिया। संघ ने यह पहली बार नहीं किया बल्कि 2009 में लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में लोकसभा चुनावों में 132 सीटे रह जाने पर आडवाणी को हटा ने का फैसला किया और मौका पाकर पाकिस्तान में जिन्ना की मजार जो उन्होंने कहा उसे घोर निंदा का विषय बनाया और संघ ने बकायदा लालकृष्ण आडवाणी के वक्तव्य से अपनी विचार धारा को अलग कर लिया। परिणाम स्वरूप लालकृष्ण आडवाणी को नेताप्रतिपक्ष पद छोड़ना पड़ा और सुषमा स्वराज ने पद सम्हाला। लेकिन संघ ने 2013 तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह को बकायदा हुक्म दिया कि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया जाय। राजनाथ सिंह ने ऐसा ही किया।
अगर संघ और भाजपा के रिश्तों की समीक्षा की जाए तो एक पुस्तक लिखी जा सकती है।इस दृश्य को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिया है।संघ मामलों के जानकार सुब्रह्मण्यम स्वामी ने कहा है कि मोदी संघ के कभी पसंद नहीं रहे उन्हें तो अटलजी ने मुख्यमंत्री बनाया और पोषित किया लाल कृष्ण आडवाणी ने। कहा जाता है कि आडवाणी ने गुजरात दंगों के समय अटल बिहारी वाजपेई को नरेंद्र मोदी से इस्तीफा न लेने के लिए मनाया। लेकिन उस समय संघ हिन्दू विचारधारा के कारण साथ था। बताया जाता है कि मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को सोनिया गांधी द्वारा प्रताड़ित करने पर संघ ने नरेंद्र मोदी का साथ दिया।
अब बात करते वर्तमान समय की राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ हमेशा भारतीय जनता पार्टी में गहरी दखल रखता है क्योंकि
लगभग भाजपा नेता संघ से ही आए हैं जिनमें राजनाथ सिंह, अमित शाह,जेपी नड्डा, धर्मेंद प्रधान, मनोहरलाल कट्टर, और लगभग एक दो छोड़कर सभी, निर्मला सीतारमण, एस जयशंकर, अश्वनी वैष्णव, ।सहित सभी मुख्यमंत्री, हेमंत शर्मा को छोड़कर,यहां तक कि कार्यकर्ता भी संघ के ही है।
संघ में यह परिपाटी दीनदयाल उपाध्याय से चली आ रही है
तत्कालीन संघ प्रमुख गुरु गोलवलकर ने उन्हें राजनीतिक दल बनाने का काम दिया था। उसके बाद 1954 से अटल बिहारी वाजपेई, लालकृष्ण आडवाणी, सुंदर सिंह भंडारी, मदनलाल खुराना, कृष्ण चंद्र शर्मा को , संघ जनसंघ भजा।
अब संकट यह है कि संघ चाहता है कि पार्टी अध्यक्ष पद पर ऐसा व्यक्ति बैठे जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह से पूछताछ कर सके।जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सत्ता दो केंद्र नहीं बनना देना चाहते हैं।
इसी लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुप और संयत हैं और दूर से खेल को देख रहे हैं। हालांकि दत्तात्रेय होसबोले से उन्होंने अपनी इच्छा जाहिर कर दी है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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