मुद्दा: जमीन पर और अधिक कब्जे का लोभ यमुना को जीवित नहीं रहने दे रहा
भाजपा दिल्ली में आबादी को बढ़ने से रोकने पर काम नहीं कर रही। इसका खमियाजा भी यमुना को उठाना पड़ रहा है, हालांकि इसकी मार भी उसी आबादी को पड़ रही है। सभी जानते हैं कि दिल्ली जैसे विशाल आबादी वाले इलाके में हर घर पानी और मुफ्त पानी बड़ा चुनावी मुद्दा है, और जब नदी-नहर पानी की कमी पूरी कर नहीं पाते तो जमीन में छेद कर पानी उलिछा जाता है, यह जाने बगैर कि इस तरह भूजल स्तर से बेपरवाही का असर यमुना के जल स्तर पर ही पड़ रहा है।
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट के एक शोध के मुताबिक, यमुना के बाढ़ क्षेत्र में 600 से अधिक आर्दभूमि और जल निकाय थे, लेकिन उनमें से 60त्न से अधिक अब सूखे हैं। रिपोर्ट में कहा गया है, ‘यमुना बाढ़ क्षेत्र में यमुना से जुड़ी कई जल-तिजोरियों का संपर्क तटबंधों के कारण नदी से टूट गया।’ समझना होगा कि अरावली से चल कर नजफगढ़ झील में मिलने वाली साहबी नदी और इस झील को यमुना से जोड़ने वाली नैसर्गिक नहर का नाला बनना हो या फिर सराय कालेखां के पास बारापुला या फिर साकेत में खिड़की गांव का सतपुला या फिर लोधी गार्डन की नहरें, असल में ये सभी यमुना में जब कभी क्षमता से अधिक पानी आ जाता था तो उसे जोहड़-तालाब में सहेजने का जरिया थीं। एनजीटी में इन सभी जल मागरे को बचाने के मुकदमे चल रहे हैं लेकिन इन पर अतिक्रमण अनवरत जारी है। सो, न अब बरसात का पानी तालाब में जाता है, और न ही बरसात के दिनों में सड़कों पर जलजमाव रुक पाता है।
वैसे, एनजीटी 2015 में ही दिल्ली के यमुना तटों पर निर्माण पर पाबंदी लगा चुका है लेकिन इससे बेपरवाह सरकारें मान नहीं रहीं। अभी एक साल के भीतर ही लाख आपत्तियों के बावजूद सराय कालेखां के पास ‘बांस घर’ के नाम से केफेटेरिया और अन्य निर्माण हो गए। जान लें कि यदि दिल्ली को जलभराव से नहीं जूझना है तो यमुना अविरल बहे, उसकी गहराई और पाट बचे रहें, यही अनिवार्य है। यह बात कोई जटिल रॉकेट साइंस नहीं है। लेकिन बड़े ठेके, बड़े दावे, नदी से निकली जमीन पर और अधिक कब्जे का लोभ यमुना को जीवित रहने नहीं दे रहा। तैयार रहिए, भले ही अदालत डांटती रहे-अपनी संपदा यमुना को चोट पहुंचाने के चलते सावन-भादों में तो हर फुहार के साथ दिल्ली डूबेगी ही!

