खा़सियत: जब हार-जीत की चर्चा में डूबे हैं सब, हरदा सामाजिक चिंतन में व्यस्त हैं तब

खा़सियत: जब हार-जीत की चर्चा में डूबे हैं सब, हरदा सामाजिक चिंतन में व्यस्त हैं तब
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देहरादून। उत्तराखंड में 14 फरवरी को मतदान संपन्न हो जाने के बाद से जहां तमाम राजनीतिक दल और उम्मीदवार अपनी अपनी जीत-हार को लेकर कयासबाजी में खोए हुए हैं, वहीं पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत उन सबसे अलग प्रदेश के बुनियादी मुद्दों पर लगातार चिंतनशील दिखाई दे रहे हैं। संस्कृति एवं विरासत के संरक्षण की हिमायत करने वाले हरदा आम जनमानस की बेहतरी के लिए भी फिक्रमंद नज़र आते हैं। चुनावी घमासान के बीच अन्य राज्यों में चुनाव प्रचार करते हुए भी हरीश रावत सोशल मीडिया के माध्यम से राज्य में जनोन्मुखी शासन व्यवस्था की स्थापना को लेकर अपनी चिंताओं को आम जनमानस के साथ लगातार साझा करते रहते हैं। राज्य में जमीन से जुड़े लोगों के जीवन स्तर को ऊंचा उठाने की सकारात्मक सोच रखने वाले हरदा आए दिन सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते हैं।

हरीश रावत लिखते हैं- ‘हमारे राज्य में कुछ ऐसे सामाजिक समूह हैं जिन्हें सरकार की किसी भी व्यवस्था का कोई लाभ नहीं मिल पा रहा है, जबकि सरकार के कुछ नियमों ने और कुछ समाज में आए बदलाव ने इनके परंपरागत काम धंधों को, जो इनकी आजीविका के साधन थे, छीन लिया है। इनमें एक ऐसा वर्ग गंधर्व भी है जो पहले शादी विवाह में, रामलीलाओं के आयोजन में कई तरीके से अपनी कला को माध्यम बनाकर अपना जीविकोपार्जन करते थे। ऐसा ही दूसरा वर्ग सपेरा भी है जिनको स्नेक चार्मर कहा जाता है। ये बहुत बड़ी संख्या में हैं, कई इलाकों के अंदर इनकी वसासतें भी बसी हुई हैं क्योंकि अब सांप को नचाना और पकड़कर के रखना आदि प्रतिबंधित है तो इनसे इनका परंपरागत धंधा छिन गया है। कोई वैकल्पिक हुनर इनको सिखाया नहीं गया है। घुमंतू जातियां होने के कारण ये शिक्षा से भी वंचित हैं। इसी प्रकार का एक वर्ग नटों और ठठेरों का भी है, इनके भी परंपरागत व्यवसायों के अब कद्रदान नहीं रह गये हैं।

ऐसे वर्गों को जिनमें बंजारा जाति का भी एक बड़ा हिस्सा सम्मिलित है किसी न किसी प्रकार से आजीविका के साथ जोड़ना और शिक्षा के क्षेत्र में लाकर विशेष प्रोत्साहन की योजना बनाना आवश्यक है और कुछ वर्ग इनमें से यदि आरक्षण की परिधि में आ सकते हैं तो उस परिधि में इनको लाया जाना भी आवश्यक है। मैं समझता हूं उत्तराखंड में जो नई सरकार बने उसको एक सर्वेक्षण ऐसे वर्गों का करना चाहिए और उस अध्ययन के आधार पर इन वर्गों को राज्य के विकास की मुख्य धारा का हिस्सेदार बनाया जाना चाहिए।’

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