विधानसभा चुनाव: क्या उत्तराखंंड के राजनीतिक मिथक टूटेंगे इस बार
देहरादून। उत्तराखंड के लिए एक बड़ा संयोग है कि यहां जब जब भी विधानसभा चुनाव होते हैं तो चुनावी चर्चाओं के साथ साथ उनसे जुड़े कुछ मिथकों पर भी बातें कौतूहल का सबब बन जाती हैं। विधानसभा चुनावों में हार-जीत के साथ ही मिथक के तौर पर स्थापित हो चुकी कई बातों को लेकर भी कयासबाजी का दौर शुरू हो जाता है। राज्य गठन के बाद यहां अब तक हुए चार चुनावों का इतिहास रहा है कि हर बार किसी भी दल की सरकार रिपीट नहीं होती है।अब तक शिक्षा मंत्री रहे सभी नेताओं को चुनाव में हार का सामना करना पड़ा है। दिलचस्प बात यह है कि तीन आम चुनाव में सिटिंग मुख्यमंत्री तो विधायक भी नहीं बन सके। राज्य की दो सीट ऐसी हैं, जिन पर जिस दल का प्रत्याशी जीता उसी के दल की सरकार बनी। एक सीट सीट ऐसी भी है जहां से जीतने वाले विधायक को हमेशा विपक्ष में ही रहना पड़ा है। इस बार के चुनाव में भी मतदान के बाद ऐसे ही मिथकों के टूटने या जा़री रहने की संभावनाओं को लेकर चर्चाओं का सिलसिला चल निकला है। कयासबाजी का विषय बने इन राजनीतिक मिथकों
सबसे बड़ा मिथक यह है कि अब तक लगातार यहां किसी भी दल की सरकार नहीं बनी। नवंबर 2000 में राज्य बनाने वाली भाजपा को दो साल बाद 2002 में ही सत्ता से हाथ धोना पड़ा और जनता ने सत्ता कांग्रेस के हाथों सौंप दी। 2007 में कांग्रेस और भाजपा में से किसी को भी स्पष्ट बहुमत नहीं मिला और निर्दलीयों के सहयोग से भाजपा सरकार बनाने में कामयाब हुई और कांग्रेस को सत्ता से बाहर रहना पड़ा। 2012 में भी सत्तारूढ़ भाजपा बावजूद एक सीट से पिछड़ गई और कांग्रेस ने सरकार बना ली। 2017 में भाजपा ने 70 में 57 सीटें लेकर प्रचंड बहुमत से सरकार बनाई। इसको देखते हुए अब 2022 के चुनावों पर सबकी नजर टिकी है।
दूसरा मिथक पिछले तीन चुनावों में सिटिंग मुख्यमंत्री का विधायक भी न बन पाने का है। सिटिंग सीएम या तो चुनाव ही नहीं लड़े और लड़े भी तो उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा। 2007 के चुनावों में तत्कालीन मुख्यमंत्री एनडी तिवारी ने चुनाव ही नहीं लड़ा। 2012 के चुनाव में तत्कालीन सीएम बीसी खंडूड़ी को कोटद्वार सीट से हार का सामना करना पड़ा। 2017 में तो सिटिंग मुख्यमंत्री हरीश रावत हरिद्वार ग्रामीण और किच्छा सीट से चुनाव लड़े पर दोनों ही सीट से उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा। इस बार सिटिंग मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी खटीमा सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। ऐसे में सभी की निगाहें इस सीट के नतीजे पर इस वजह से भी लगी है कि क्या इस बार ये मिथक टूट जाएगा या फिर बरकरार रहेगा। इस मामले में केवल भगत सिंह कोश्यारी ही अपवाद रहे हैं। वे 2002 में भाजपा के टिकट पर राज्य की पहली निर्वाचित विस के सदस्य चुने गए। लेकिन सरकार बनाने का मौका कांग्रेस को मिला था।
उत्तराखंड में शिक्षा मंत्री के चुनाव हारने का मिथक तो 2002 से से ही चल रहा है। भाजपा की अंतरिम सरकार में शिक्षा मंत्री रहे तीरथ सिंह रावत को चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। कांग्रेस की एनडी तिवारी सरकार में शिक्षा मंत्री नरेंद्र सिंह भंडारी 2007 में विधानसभा नहीं पहुंच सके। 2007 में खंडूड़ी सरकार के शिक्षा मंत्री गोविंद सिंह बिष्ट भी 2012 में चुनाव हार गए। कांग्रेस सरकार में शिक्षा मंत्री रहे मंत्री प्रसाद नैथानी को भी 2017 में हार का सामना करना पड़ा। मौजूदा धामी सरकार में शिक्षा मंत्री अरविंद पांडेय इस पर गदरपुर सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। इस चुनाव के नतीजे शिक्षा मंत्री पर क्या निर्णय सुनाते हैं, लोगों को इसका इंतजार है।
उत्तराखंड में चुनाव को लेकर कुछ और भी मिथक हैं। यहां तीन सीटें ऐसी हैं, जो सत्ता प्राप्ति के समीकरण बनाती रही हैं। ऐसी ही एक सीट है गंगोत्री विधानसभा। इससे जुड़ा एक सियासी मिथक है कि जो भी सियासी दल इस सीट को जीतता है, सरकार उसी दल की बनती है। 2002 में हुए पहले चुनाव में कांग्रेस के विजयपाल सिंह सजवाण, 2007 में भाजपा के गोपाल सिंह रावत, 2012 में कांग्रेस के विजयपाल सिंह सजवाण, 2017 में भाजपा के गोपाल सिंह रावत जीते। नतीजा यह रहा कि सरकार भी इन जीतने वाले प्रत्याशियों के दलों की ही बनी।
इसी तरह का एक मिथक कोटद्वार से भी जुड़ा है। इस सीट से जिस दल का विधायक जीता सरकार उसी दल की बनी। 2002 में कोटद्वार से कांग्रेस के सुरेंद्र सिंह नेगी विजयी रहे तो कांग्रेस के एनडी तिवारी की सरकार बनी। 2007 में भाजपा के शैलेन्द्र सिंह रावत जीते तो भाजपा ने सरकार बनाई। 2012 में एक बार फिर कांग्रेस के सुरेंद्र सिंह नेगी विजयी रहे और कांग्रेस की सरकार बनी। इसी तरह से 2017 में कांग्रेस से बगावत करके भाजपा में आए डाॅ हरक सिंह रावत विधायक चुने गए तो सरकार भी भाजपा की बनी। इस बार इस सीट से कांग्रेस की ओर से एक बार फिर सुरेंद्र सिंह नेगी मैदान में हैं तो भाजपा ने यमकेश्वर की विधायक रही रितु खंडूड़ी को टिकट दिया है। अब ये 10 मार्च को ही तय होगा कि यह मिथक टूटेगा कि बरकरार रहेगा।
अल्मोड़ा जिले की रानीखेत सीट का मिथक एकदम अलग है। इस क्षेत्र की जनता ने जिस भी दल के प्रत्याशी को जिताया, उस दल को विपक्ष में रहना पड़ा है। 2002 में भाजपा के अजय भट्ट रानीखेत के विधायक बने तो सरकार कांग्रेस की बन गई। 2007 में कांग्रेस के करन माहरा जीते तो सरकार भाजपा ने बनाई। इसी तरह 2012 में फिर भाजपा के अजय भट्ट जीते तो सरकार कांग्रेस की बन गई। वर्ष 2017 में तो गजब हुआ। मोदी लहर के बावजूद भाजपा के प्रत्याशी अजय भट्ट यहां से चुनाव हार गए और कांग्रेस के करन महरा सदन में पहुंचे। इस तरह से मिथक फिर भी बरकरार रहा।
अब 10 मार्च हो ही साफ हो जाएगा कि उत्तराखंड के विधानसभा चुनाव को लेकर बीस सालों से चले आ रहे मिथकों में से कौन टूटते हैं और कौन बरकरार रह पाते हैं।
