मुद्दा: देश में गैर बैंकिंग संस्थाओं पर नकेल कसना जरूरी  

मुद्दा: देश में गैर बैंकिंग संस्थाओं पर नकेल कसना जरूरी  
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क समय हमारे देश के ग्रामीण जन साहूकारों के चंगुल में फंसे हुए थे।  वर्षा आधारित कृषि व्यवस्था होने की वजह से फसल से आय होना अनिश्चित था, इस वजह से हमारे किसान साहूकारों से कर्ज लेकर एक तरह से खुद को गिरवी रख देते थे।  पिछले दो-तीन दशकों में स्थिति बदली। सहकारिता और राष्ट्रीयकृत बैंकों की वजह से किसानों को कर्ज लेने में आसानी हुई, लेकिन उदारीकरण के दौर में जिस तरह से निजी बैंकिंग क्षेत्र का हस्तक्षेप बढ़ा वैसे-वैसे फिर से किसान परेशानी में आ गए हैं।  हाल ही में एक आर्थिक रिपोर्ट के अनुसार भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्र में ऋण का बढ़ता स्तर चिंता का विषय है। कुछ गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां ग्रामीणों की आर्थिक विवशता का दुरुपयोग कर उनका शोषण कर रही हैं।  ऐसे ऋणों की मार्केटिंग बेहद आक्रामक तरीके से ऐसे की जाती है कि ऋण लेने वाले इनके दीर्घकालिक वित्तीय परिणामों से वाकिफ नहीं हो पाते और कर्ज के जाल में फंस जाते हैं। इन पर नकेल कसना जरूरी है।  दरअसल, इस संकट के मूल कारणों में से एक, देश के ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार के पर्याप्त अवसरों का अभाव है।  आर्थिक वृद्धि का लाभ भी पर्याप्त रूप से रोजगार सृजन में नहीं दिखा है, खासतौर पर गैर-कृषि क्षेत्रों में ऋण की आसान पहुंच और चौबीस घंटे डिलिवरी सेवाओं के प्रसार से ग्रामीण क्षेत्रों में खपत की स्थिति बढ़ी है।  लोगों को गैर-जरूरी वस्तुओं और सेवाओं के वास्ते ऋण लेने के लिए लुभाया जा रहा है जिससे वे और अधिक कर्ज के जंजाल में फंस रहे हैं।  ग्रामीण क्षेत्रों के परिवार, रोजमर्रा की अपनी जरूरतों के लिए भी ऋण की राशि पर निर्भर हो रहे हैं।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था में आय के स्रोत अनिश्चित हैं और यह मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर है। यह अप्रत्याशित मॉनसून, जिंसों की उतार-चढ़ाव वाली कीमतों और बढ़ती इनपुट लागत से भी प्रभावित होती है।  गैर बैंकिंग संस्थाएं इस अंतर का फायदा उठा रहे हैं और रोजमर्रा की खपत के लिए ऋण अधिक ब्याज दरों पर देते हैं। इसमें ऋणों का रॉल ओवर चक्र एक अहम हिस्सा है। इसका सबसे बड़ा संस्थागत उदाहरण फसल ऋण है।  सरकार हर वर्ष, किसानों को फसल ऋण का वितरण करने के लिए बैंकों के लिए महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित करती है।  इन लक्ष्यों को पूरा करने के लिए बैंकों पर दबाव होता है जिसके कारण अक्सर ऋणों का वितरण तेजी से यह सुनिश्चित किए बिना ही कर दिया जाता है कि इनका उपयोग उत्पादक तरीके से किया जाएगा या नहीं।  इस ऋण का इस्तेमाल उत्पादक कृषि निवेश के लिए किए जाने के बजाय, तत्काल जरूरतों को पूरा करने या पुराने ऋण का भुगतान करने के लिए किया जाता है जिससे ग्रामीण ऋण संकट गहरा जाता है। कुछ बैंक जिनकी सार्वजनिक जमाओं तक कम लागत के साथ पहुंच है वे भी गैर बैंकिंग नेटवर्क की तुलना में कभी-कभी सूक्ष्म ऋण पर, उच्च ब्याज दर वसूल रहे हैं।  अगर गैर बैंकिंग क्षेत्र की जांच-पड़ताल उनके ब्याज दरों के लिए की जा रही है तब क्या इस लिहाज से बैंकों की जांच नहीं की जानी चाहिए? ग्रामीण क्षेत्रों में ऋण की लागत कर्ज लेने वाले की भुगतान क्षमता के मुकाबले गैर-आनुपातिक तरीके से बढ़ रही है जिसके चलते ऋण का चक्र और जटिल हो रहा है।
ग्लोबल डेवलपमेंट इन्क्यूबेटर की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीण क्षेत्र के 50 प्रतिशत से अधिक लोगों की आमदनी का प्राथमिक स्रोत खेती है लेकिन इनमें से अधिकांश लोग बेहतर मौके पाने के लिए खेती छोड़ने के लिए तैयार हैं।  देश के अनेक आर्थिक विशेषज्ञ मानते हैं कि दरअसल कृषि को समृद्धि का इंजन होना चाहिए यानी यदि हमारे किसान खेती छोड़कर दूसरा कोई व्यवसाय करते हैं तो दीर्घकालिक हितों की दृष्टि से यह घाटे का सौदा होगा।  इसलिए जरूरी है कि खेती को लाभ का व्यवसाय बनाया जाए तथा किसानों को गैर बैंकिंग संस्थाओं के आर्थिक शोषण से मुक्ति दिलाई जाए।  दरअसल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए अभी बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है।  केंद्र और राज्य सरकारों को इस ओर ध्यान देना चाहिए।

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