आकलन: राहुल गांधी को मंझली कतार के सगतिया चाहिए

आकलन: राहुल गांधी को मंझली कतार के सगतिया चाहिए
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पंकज शर्मा

ज़ राहुल गांधी को मंझली कतार के सगतिया चाहिए। इसलिए उन्हें अपने लिए एक कारगर मध्यम-पंक्ति की संरचना करनी है।
लोकसभा में प्रियंका गांधी के भाषण को भले ही आप अद्भुत और ऐतिहासिक की श्रेणी में न रखें, मगर इतना तो आप भी मानेंगे कि उन की संप्रेषण कुशलता ने कांग्रेसजन में एक नया उछाह पैदा किया है।
उन की स्त्रियोचित सौम्य-आक्रामकता ने सदन में बैठे अमित भाई शाह और राजनाथ सिंह समेत समूचे सत्तापक्ष की शिराओं में थोड़ी कंपकंपी पैदा की है और देश को प्रतिपक्ष, और ख़ासकर कांग्रेस, की प्रभावी भूमिका के लिए आश्वस्त किया है।
जब प्रियंका बोल रही थीं, तब राहुल गांधी भी सदन में मौजूद थे, संजीदगी से उन की कही बातें सुन रहे थे, गंभीरता से उन के कहे को गुन रहे थे और लगता था कि मन-ही-मन कांग्रेस की आगामी प्रस्तावना के धागे बुन रहे थे।
ये धागे फिलवक़्त साढ़े चार बरस लंबे तो फैले हुए हैं ही। केंद्र की सत्ता के लिए राहुल-प्रियंका को अभी न्यूनतम साढ़े चार बरस तो राजनीतिक संघर्ष करना ही होगा।
कोई बड़ी बात नहीं कि उन का यह रास्ता साढ़े नौ साल लंबा खिंच जाए। सो, सवाल यह है कि राहुल-प्रियंका तो जूझ लेंगे, मगर क्या उन के पास साढ़े चार या साढ़े नौ बरस तक युद्धरत रह सकने वाली मध्यम-पंक्ति है?
क्या ऐसे जुझारू, अविचल और प्रतिबद्ध हमजोली हर राज्य में उन की बगल में खड़े दिखाई दे रहे हैं, जो सियासत के लगातार पथरीले होते जाने वाले भावी मैदान में 54 या 114 महीने उन के साथ खड़े रहें?
और, जब मैं यह सवाल उठा रहा हूं तो मेरा सवाल इंडिया-समूह के कथित साथियों के बारे में नहीं है। इंडिया-समूह तो समझ लीजिए कि तिरोहित हो चुका है। उस की आस लगाए बैठना अब राहुल गांधी की भूल होगी।
मैं तो यह पूछ रहा हूं कि कांग्रेस के भीतर भी ऐसे लोग अब कितने रह गए हैं, जिन के भरोसे राहुल आगे की दुर्जेय राह पर चलते चले जाएंगे?
जैसे कि आप जानते हैं, वैसे ही मैं भी जानता हूं कि राहुल ‘एकला चलो’ के शीरे की कड़ाही से जन्मे हैं और कोई साथ आए-न-आए, अपने गंतव्य तक अनवरत अकेले चलते रहने का माद्दा रखते हैं।
इस कर्म-भाव की झौंक में यह परवाह भी वे शायद ही करते हैं कि मंजि़ल तक पहुंचेंगे या नहीं? उन्हें तो बस चलते रहना है। सो, वे तो चलते रहेंगे।
प्रियंका भी अब इस यात्रा में उन की अटल परछाईं होंगी, लेकिन आखिऱ एक राजनीतिक यात्रा इस तरह अकेले तो पूरी होती नहीं।
राजनीतिक ही क्यों, कोई भी यात्रा कब किस की अकेले पूरी हुई है? प्रभु राम की यात्रा क्या अकेले संपन्न हो पाई? श्रीकृष्ण का सफऱ क्या एकाकी था? लक्ष्य तन्हा हासिल नहीं होते।
वे तब प्रस्थापित होते हैं, जब हर स्तर पर सेनानियों की टोलियां संग-संग चलती हैं।
इसलिए मुझे लगता है कि राहुल भले ही एकल-तपस्या के महारथी हों और अब प्रियंका के संसद में औपचारिक प्रवेश से उन की ताक़त चौगुनी हो गई हो, मगर साढ़े चार साल बाद की रणभेरी के लिए इतना ही काफी नहीं है।
राहुल गांधी को मंझली कतार के सगतिया चाहिएं और ईमानदारी की बात यह है कि कांग्रेस में न तो अभी वे दूर-दूर तक कहीं दिखाई दे रहे हैं और न उन्हें खोजने-बीनने का कोई उपक्रम कहीं नजऱ आ रहा है।
एक छोटा-सा अर्थवान समूह भी इस वक़्त राहुल के आसपास मौजूद है और एक विशाल मतलबपरस्त टोली भी उन से चिपटी हुई है।
नेकनीयत समूह के ज़्यादातर चेहरे वृद्धावस्था के उस चरण में पहुंच चुके हैं, जहां से वानप्रस्थ की राह आरंभ होती है।
जो उम्र के लिहाज़ से अभी दस-पंद्रह बरस राहुल की शेरपाई कर सकते हैं, उन की बदनसीबी यह है कि उन का तीन चौथाई समय ख़ुदग़र्ज़ चौकड़ी के जालबट्टों की उलझनों से निपटने में बीत रहा है।
यहां मैं उन बदनसीबों की बात नहीं कर रहा हूं, जो शामियाने के बाहर खड़े-खड़े कसमसा रहे हैं।
मैं उन की बात कर रहा हूं, जो बैठे तो राहुल के दस्तरख़्वान पर हैं, मगर फिर भी हर रोज़ किनारे ठेले जाते हैं।
कांग्रेस की कार्यसमिति में सत्तासीन जमात के बुद्धि-जीवियों और प्रतिपक्षी श्रम-जीवियों के बीच की यह टप्पेबाज़ी देखने-समझने के लिए किसी दिव्य-ख़ुर्दबीन की ज़रूरत नहीं है। जो अपनी अक़्ल चला कर जीवित हैं, वे मेहनत पर जिंदा लोगों को कहां जीने देते हैं?
कांग्रेस में यह किस्सा कोई नया नहीं है। मगर नई बात यह है कि जब से नरेंद्र भाई मोदी रायसीना पर्वत पर काबिज़ हुए हैं, तब से कांग्रेस के भीतर खोखले किरदारों की जऱा ज़्यादा ही बहार आ गई है।
उन में से बहुत-से तो ऐसी सदाबहार-स्थिति को प्राप्त कर चुके हैं कि अगर ख़ुद राहुल-प्रियंका भी चाहें तो अब उन का बाल बांका नहीं कर सकते हैं।
राहुल-प्रियंका से ‘आयुष्मान भव:’ का आशीर्वाद पाने के बाद भस्मासुरी-रंगत में आ गए ये तत्व अब भाई-बहन पर ही भारी पड़ने लगे हैं।
अपने चार दशक से ज़्यादा के पत्रकारीय जीवन में मैं ने कांग्रेस समेत किसी भी राजनीतिक दल के शीर्ष नेतृत्व को इस से पहले इतनी असहाय हालत में कभी नहीं देखा था।
नरेंद्र भाई मोदी के चक्रव्यूह को तहस-नहस करने घर से निकले राहुल-प्रियंका की, पता नहीं, ऐसी कौन-सी लाचारी है कि वे कांग्रेस के भीतर के इस मकडज़ाली चक्रव्यूह को ही नहीं भेद पा रहे हैं?
आज की गई-बीती हालत में भी कांग्रेस के पास 100 लोकसभा सदस्यों, 27 राज्यसभा सदस्यों और 650 विधायकों का ठीकठाक राजनीतिक संसाधन है।
उसे छह महीने पहले हुए लोकसभा के चुनाव में सवा 21 प्रतिशत वोट मिले हैं। देश भर के पौने 14 करोड़ लोगों ने कांग्रेस के पक्ष में मतदान किया है। जिन्हें दिखता हो, देखें, मगर मुझे इस में कांग्रेस की दरिद्रता नहीं, उस की समृद्धि दिखाई देती है।
और, इतने प्रतिकूल मौसम में भी कांग्रेस को अपनी इस आसूदगी के लिए राहुल का ऋणी होना चाहिए।
जऱा जनतंत्र के द्वारपाल की भूमिका से राहुल की अनुपस्थिति की कल्पना तो कर के देखिए कि अगर वे नहीं होते तो इन दस बरस में एकतंत्रवादी तत्वों ने कैसे लोकतंत्र को पूरी तरह लील लिया होता!
इस बीच इंडिया-समूह में शामिल कुछ क्षत्रपों ने राहुल को किनारे कर किसी और को गठबंधन का नेतृत्व सौपने की तरफ़दारी की है।
मगर उन्हें समझना चाहिए कि इंडिया-समूह का जन्म जिस मूल अवधारणा को ले कर हुआ है, उस के चलते गठबंधन की अगुआई सिर्फ़ वही व्यक्ति कर सकता है, जिस का इतिहास अपनी वैचारिक निष्ठा को ले कर अविचल प्रतिबद्धता का रहा हो और जिस के बारे में पूरा मुल्क़ यह धारणा रखता हो कि चाहे कुछ भी हो जाए, वह अपने विचारों और सिद्धांतों से कभी भी डिगेगा नहीं।
आप ही बताइए, इस कसौटी पर इंडिया-समूह में शामिल सियासी घटकों के कितने चेहरे खरे उतरते हैं? इसलिए मैं मानता हूं कि इंडिया-समूह के पास राहुल के नेतृत्व का कोई विकल्प न तो है, न कभी होगा।
राहुल की कलाई पर बंधे इस विशेष स्थिति के कलावे के बावजूद उन्हें अभी तो अपनी ही पार्टी के आंतरिक तानेबाने को सुलझाना है, मजबूत बनाना है और अपने लिए एक कारगर मध्यम-पंक्ति की संरचना करनी है।
जितनी जल्दी वे यह काम कर लें, बेहतर है, क्योंकि लोकसभा के बाद हुए चार राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजों ने कांग्रेस और विपक्ष के मनोबल को झकझोर दिया है।
कांग्रेस के कायाकल्प में अब थोड़ी भी देरी राहुल-प्रियंका की नेतृत्व क्षमता पर खंरोच लगाने वाली साबित होगी।
(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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