उपचार: स्वास्थ्य के लिए खतरे की घंटी है एंटीबायोटिक का दुरुपयोग
डॉ. सत्यवान सौरभ
एंटीबायोटिक्स महत्वपूर्ण औषधियां हैं। कई एंटीबायोटिक्स बैक्टीरिया से होने वाले संक्रमण (जीवाणु संक्रमण) का सफलतापूर्वक इलाज कर सकते हैं। एंटीबायोटिक्स बीमारी को फैलने से रोक सकते हैं। और एंटीबायोटिक्स गंभीर रोग जटिलताओं को कम कर सकते हैं। लेकिन कुछ एंटीबायोटिक्स जो बैक्टीरिया संक्रमण के लिए विशिष्ट उपचार हुआ करते थे, अब उतना अच्छा काम नहीं करते हैं। और कुछ दवाएं कुछ जीवाणुओं के विरुद्ध बिल्कुल भी काम नहीं करती हैं। जब कोई एंटीबायोटिक बैक्टीरिया के कुछ उपभेदों के खिलाफ काम नहीं करता है, तो उन बैक्टीरिया को एंटीबायोटिक प्रतिरोधी कहा जाता है। एंटीबायोटिक प्रतिरोध दुनिया की सबसे जरूरी स्वास्थ्य समस्याओं में से एक है। सर्दी और अन्य वायरल बीमारियों के लिए एंटीबायोटिक्स लेना काम नहीं करता है और यह ऐसे बैक्टीरिया पैदा कर सकता है जिन्हें मारना कठिन होता है। बहुत बार या गलत कारणों से एंटीबायोटिक लेने से बैक्टीरिया में इतना बदलाव आ सकता है कि एंटीबायोटिक्स उनके खिलाफ काम नहीं करते हैं। इसे जीवाणु प्रतिरोध या एंटीबायोटिक प्रतिरोध कहा जाता है।
लेकिन अगर कोई व्यक्ति बार-बार एंटीबायोटिक का इस्तेमाल कर रहा है तो बैक्टीरिया उस दवा के खिलाफ अपनी इम्युनिटी डवलप कर लेती है। इसके बाद इसे ठीक करना काफी ज्यादा मुश्किल होता है। इसे ही एंटी माइक्रोबियल रेजिस्टेंस कहते हैं। ऐसी स्थिति में इलाज तो ठीक से हो नहीं पाता बल्कि लिवर में टॉक्सिन जमा होने लगता है। राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र ने हाल ही में एक सर्वेक्षण में पाया कि अध्ययन के लिए सर्वेक्षण किए गए लगभग 10,000 अस्पताल के मरीजों में से आधे से अधिक को संक्रमण का इलाज करने के बजाए रोकने के लिए एंटीबायोटिक्स दिए गए थे। यह एक चिंताजनक संकेत है, क्योंकि भारत दुनियाभर में दवा प्रतिरोधी रोगजनकों के सबसे बड़े बोझ में से एक है, जिससे रोगाणुरोधी प्रतिरोध (एएमआर) के बड़े मामले सामने आते हैं। एंटीबायोटिक दवाओं का अत्यधिक उपयोग- विशेष रूप से तब एंटीबायोटिक लेना जब वे सही उपचार न हों- एंटीबायोटिक प्रतिरोध को बढ़ावा देता है। रोग नियंत्रण और रोकथाम केंद्रों के अनुसार, लोगों में लगभग एक-तिहाई एंटीबायोटिक का उपयोग न तो आवश्यक है और न ही उचित है।
एंटीबायोटिक्स बैक्टीरिया से होने वाले संक्रमण का इलाज करते हैं। लेकिन वे वायरस से होने वाले संक्रमण (वायरल संक्रमण) का इलाज नहीं करते हैं। उदाहरण के लिए बैक्टीरिया के कारण होने वाले स्ट्रेप गले के लिए एंटीबायोटिक सही इलाज है। लेकिन यह अधिकांश गले की खराश के लिए सही इलाज नहीं है, जो वायरस के कारण होती हैं। भारत ने रोगाणुरोधी प्रतिरोध पर राष्टÑीय कार्य योजना (एनएपी-एएमआर) को लागू करके, रोगाणुरोधी प्रतिरोध कम करने में एक बड़ा कदम उठाया है, जो दुनियाभर में बढ़ती चिंता का विषय बन रहा है। यह रोगाणुरोधी प्रतिरोध पर भारत की राष्टÑीय कार्य योजना का एक प्रमुख घटक है। यह रणनीति स्वास्थ्य कर्मियों, आम जनता के साथ-साथ पशु चिकित्सा और कृषि उद्योगों में हितधारकों को शिक्षित करने के महत्व पर जोर देती है। यह शैक्षिक पहल जिम्मेदार व्यवहार को बढ़ावा देने और एंटीबायोटिक दवाओं के दुरुपयोग को कम करने में महत्वपूर्ण है। योजना मानती है कि रोगाणुरोधी प्रतिरोध केवल मानव स्वास्थ्य के लिए एक चुनौती नहीं है, यह पशु चिकित्सा और पर्यावरणीय सेटिंग में एंटीबायोटिक के दुरुपयोग का भी परिणाम है। जिनमें स्वास्थ्य, पशुपालन, कृषि और पर्यावरण के लिए जिम्मेदार मंत्रालय शामिल हैं।
रोगाणुरोधी प्रतिरोध पर राष्ट्रीय कार्य योजना मजबूत डेटा संग्रह और निगरानी के महत्व को रेखांकित करती है। इसमें कृषि, मानव स्वास्थ्य और पशु चिकित्सा क्षेत्रों में एंटीबायोटिक दवाओं के उपयोग की बारीकी से निगरानी करना शामिल है। हर दिन, हजारों लोग संक्रामक रोगों के इलाज के लिए अस्पतालों में भर्ती होते हैं जिन्हें एंटीबायोटिक चिकित्सा की आवश्यकता होती है। अस्पताल में भर्ती मरीजों के बीच एंटीबायोटिक का दुरुपयोग रोगाणुरोधी प्रतिरोध, प्रतिकूल घटनाओं और उपचार लागत का प्रमुख कारण है । प्रभावी और तर्कसंगत चिकित्सा को बढ़ावा देने के लिए अस्पताल की सेटिंग में एंटीबायोटिक सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए। इस बात के प्रमाण बढ़ रहे हैं कि मरीजों के लिए एंटीबायोटिक नुस्खे बढ़ाने के उपायों से मरीजों को मदद मिल सकती है। स्वास्थ्य देखभाल चिकित्सकों को अनुचित इनपेशेंट प्रिस्क्राइबिंग को कम करने में सहायता करने के लिए यह निर्धारित करना आवश्यक है कि अस्पतालों में कितनी बार गलत इनपेशेंट प्रिस्क्राइबिंग होती है और कम प्रिस्क्राइबिंग से मरीजों को कितना लाभ होगा!
एंटीबायोटिक नुस्खे दिशा निर्देशों की निगरानी और अनुपालन को लागू करने के लिए एक मजबूत नियामक ढांचा होना चाहिए। इसमें गैर-अनुपालन को दंडित करने और अनुपालन को प्रोत्साहित करने के तंत्र शामिल हैं। एंटीबायोटिक प्रतिरोध पैटर्न की नियमित निगरानी महत्वपूर्ण है। दिशा निर्देशों की प्रभावशीलता का आकलन समय के साथ प्रतिरोध पैटर्न में परिवर्तनों को ट्रैक करने और सुधारात्मक कार्रवाई करने की क्षमता से किया जा सकता है। प्रतिरोध को कम करने के लिए आरक्षित एंटीबायोटिक दवाओं तक पहुंच को प्रतिबंधित करना महत्वपूर्ण है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
सावधान: बोतलबंद पानी नहीं, जहर पी रहे हैं हम
-ज्ञानेन्द्र रावत
आधुनिक जीवनशैली के तहत हम सभी अपने जीवन को सुखमय बनाने की दिशा में अद्वितीय प्रयास कर रहे हैं। वह चाहे भौतिक सुख संसाधनों का सवाल हो, खाने-पीने का सवाल हो या फिर परिधान का ही सवाल क्यों न हो, अपनी सामर्थ्यानुसार अच्छे से अच्छे पा लेने या खाने-पीने में खर्च करने में कोई कोताही नहीं करते हैं। लेकिन पिछले लम्बे समय से माइक्रोप्लास्टिक की खाद्य पदार्थों में दिनोंदिन बढ़ती मौजूदगी चिंता का सबब बन गई है। अब तो हालत यह है कि प्लास्टिक के ये कण नदियों और महासागरों ही नहीं, पर्वतों की ऊंची-ऊंची चोटियों पर जमी बर्फ में भी मिल रहे हैं। आज स्थिति यहां तक आ पहुंची है कि अब ये पीने के पानी में भी मौजूद हैं। जिस बोतलबंद पानी को हम सबसे ज्यादा सुरक्षित मानते हैं, कई अध्ययनों ने यह खुलासा किया है कि वही पानी आजकल जानलेवा बना हुआ है। पैकेज्ड बोतलों में बंद पानी में प्लास्टिक के ये छोटे-छोटे कण जिन्हें हम माइक्रोप्लास्टिक के नाम से जानते हैं और उनको सामान्य दृष्टि से हम देख भी नहीं सकते, हमारे लिए कतई सुरक्षित नहीं हैं। इनसे हृदय रोग, मधुमेह और अन्य मानव जीवन के लिए खतरनाक बीमारियों का अंदेशा बढ़ गया है। यह बच्चों और गर्भवती महिलाओं के लिए बेहद खतरनाक है। कोलंबिया यूनीवर्सिटी के वैज्ञानिकों द्वारा स्टीमुलेटेड रैमन स्कैटरिंग माइक्रोस्कोपी की तकनीक के जरिए किए शोध जो प्रोसीडिंग्स आफ दि नेशनल ऐकेडेमी आफ साइंसेज में प्रकाशित हुआ, से खुलासा हुआ है कि अब बोतलबंद पानी में भी माइक्रोप्लास्टिक के कण मौजूद हैं। इसने दुनिया के वैज्ञानिकों को हैरत में डाल दिया है। शोध ने यह साबित कर दिया है कि बोतलबंद एक लीटर पानी में माइक्रोप्लास्टिक के औसतन 2,40,000 कण मौजूद हैं। शोध के अनुसार बोतलबंद पानी की अलग अलग बोतलों में प्रति लीटर 1,10,000 से लेकर 3,70,000 तक कण मौजूद थे जिनमें से 90 फीसदी नैनो प्लास्टिक के कण थे जबकि बाकी माइक्रोप्लास्टिक के कण थे।
दरअसल 5 मिलीमीटर से छोटे टुकड़े को माइक्रो प्लास्टिक कहा जाता है जबकि नैनो प्लास्टिक एक माइक्रो मीटर यानी एक मीटर के अरबवें हिस्से को कहा जाता है। गौरतलब यह है कि ये कण इतने छोटे होते हैं कि इंसान के पाचन तंत्र और फेफड़ों में मिलकर मस्तिष्क व हृदय समेत शरीर के सभी अंगों को प्रभावित कर सकते हैं। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि ये प्लेसैंटा से होते हुए अजन्मे बच्चे के शरीर में पहुंचकर प्रभावित कर सकते हैं। ये गैस्ट्रिक समस्या से लेकर शारीरिक असमानताओं यथा विकलांगता के कारण भी बन सकते हैं। गौरतलब है कि ये कण विभिन्न प्रकार के प्लास्टिक से उत्पन्न होते हैं जैसे कि पालीएथिलीन और पालीप्रोपिलीन जो सेहत को और खतरनाक बना सकते हैं। सबसे खतरनाक यह है कि इंसान एक साल में 10 हजार माइक्रोप्लास्टिक के टुकडे या तो खा रहा है या फिर वह सांसों के जरिये अपने शरीर में डालकर जानलेवा बीमारियों को जन्म दे रहा है।
सच तो यह है कि हम बोतलबंद पानी के रूप में पानी नहीं, जहर पी रहे हैं। यह धीरे-धीरे हमारे शरीर के अंगों को बेकार बना रहा है। इसमें प्लास्टिक कणों की मौजूदगी यदि लम्बे समय तक जारी रहती है तो सेहत के साथ-साथ हमारे पर्यावरण के लिए भी हानिकारक है। असलियत में बोतलबंद पानी में अधिकांशत: प्लास्टिक का उपयोग होता है जिसमें ऊर्जा की जरूरत पड़ती है। संसाधनों की कमी के कारण अक्सर प्लास्टिक बनाने में जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल होता है जो पर्यावरण में हानिकारक प्रदूषकों जैसे ग्रीनहाउस गैसों तथा पार्टीकुलेट मैटर आदि के उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार है। प्लास्टिक की बोतल में पानी भरने की प्रक्रिया में प्रति वर्ष 2.5 मिलियन टन कार्बन डाई आक्साइड वायुमंडल में उत्सर्जित होती है। फिर डिस्पोजेविल पानी की बोतलों का कचरा बहकर समुद्र में जाकर सालाना 9.1 मिलियन समुद्री जीवों की मौत का सबब बनता है। बोतलबंद पानी की पूरी प्रक्रिया में पारिस्थितिक तंत्र पर लगभग 2.400 गुणा अधिक दुष्प्रभाव पड़ता है और 3,500 गुणा अधिक लागत आती है। जहां तक प्लास्टिक का सवाल है,दुनिया में पानी को बोतल में बंद करने में हर साल लगभग 2.7 मिलियन टन प्लास्टिक का इस्तेमाल होता है। साथ ही उस बोतलबंद पानी को बाजार में ले जाने से वायु प्रदूषण और कार्बन डाई आक्साइड का उत्सर्जन होता है जो ग्लोबल वार्मिंग में योगदान देता है। अधिकांशत: प्लास्टिक की बोतलें जलाने से क्लोरीन गैस और भारी धातुएं जैसे जहरीले उत्पाद हवा में फैल जाते हैं। दरअसल जहां बोतलबंद पानी पर्यावरण, सार्वजनिक ही नहीं मानवीय स्वास्थ्य आदि को प्रभावित करता है, वहीं उसकी बोतलें हमारे जल भंडारों व भूजल स्रोतों को नष्ट करती हैं। इसके साथ बोतलबंद पानी का कारोबार करने वालों का स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी काफी बुरा प्रभाव पड़ता है क्योंकि वे जो पानी जमीन से खींचते हैं, उसका वे नाम मात्र का मूल्य अदा करते हैं और कहीं-कहीं तो वे वह भी नहीं चुकाते हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

