चिंताजनक: भारतीयों की जिन्‍दगी के पांच साल कम कर रहा है वायु प्रदूषण  

चिंताजनक: भारतीयों की जिन्‍दगी के पांच साल कम कर रहा है वायु प्रदूषण  
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हर्षवर्धन भट्ट  
वायु प्रदूषण पर हाल ही में शिकागो यूनिवर्सिटी की ओर से जारी रिपोर्ट में चिंताजनक आंकड़े सामने आए हैं। रिपोर्ट में दुनियाभर के जिन छह देशों में रहने वाले लोगों की जिंदगी पर वायु प्रदूषण का सबसे ज्यादा असर पड़ रहा है, उनमें भारत का भी नाम शामिल है। रिपोर्ट के मुताबिक, वायु प्रदूषण भारत के लोगों की जिंदगी के पांच साल कम कर रहा है, जबकि सिर्फ दिल्ली की बात करें तो स्थिति और भी ज्यादा खराब है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के तय मानक पांच माइक्रोग्राम पर क्यूबिक मीटर की तुलना में देश का सूक्ष्म कण वायु प्रदूषण लोगों की जिंदगी के पांच साल कम कर रहा है। रिपोर्ट में दिल्ली को दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर बताते हुए कहा गया कि वायु प्रदूषण का यहां रहने वालों के स्वास्थ्य पर सबसे ज्यादा असर पड़ रहा है और उनकी जिंदगी के 11.9 साल कम हो रहे हैं।
वहीं 2000-2016 के बीच भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में वायु प्रदूषण के प्रेगनेंसी पर असर को लेकर लैंसेट की ओर से स्टडी की गई है। शोध में सामने आया कि तीनों देशों में प्रदूषण की वजह 29 प्रतिशत प्रेगनेंसी लॉस यानी गर्भपात हुआ। इसमें से अकेले 77 प्रतिशत प्रेगनेंसी लॉस भारत में हुआ, जबकि पाकिस्तान में 12 प्रतिशत और बांग्लादेश में 11 प्रतिशत मामले सामने आए। इस स्टडी में 34,197 महिलाओं को शामिल किया गया था, जिनमें से 27,480 महिलाओं ने मिसकैरेज और 6,717 स्टिल बर्थ (बच्चे की हार्ट बीट गायब होना) झेला। शोध में कहा गया कि प्रदूषण बढ़ने के साथ मानव स्वास्थ्य का खतरा भी बढ़ गया है।  शिकागो यूनिवर्सिटी में प्रो. माइकल ग्रीनस्टोन ने कहा कि वायु प्रदूषण से दुनिया भर के लोगों के जीवन पर पड़ रहे प्रभाव का तीन चौथाई हिस्सा सिर्फ  छह देशों बांग्लादेश, भारत, पाकिस्तान, चीन, नाइजीरिया और इंडोनेशिया में है। आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि वायु प्रदूषण मानव स्वास्थ्य के लिए दुनिया का सबसे बड़ा बाहरी खतरा बना हुआ है। मानव जीवन पर वायु प्रदूषण से सबसे ज्यादा खतरे के मद्देनजर वैश्विक वायु गुणवत्ता अवसंरचना के लिए सामूहिक मौजूदा निवेश अपर्याप्त लगता है। एचआईवी-एड्स, मलेरिया और टीबी के लिए हर साल बड़े वैश्विक कोष का निवेश किया जाता है, लेकिन वायु प्रदूषण के लिहाज से ऐसा नहीं है।
स्विस फर्म आईक्यूएयर की लाइव रैंकिंग के मुताबिक, दुनिया के सबसे प्रदूषित 110 देशों की सूची में भारत के तीन शहर राजधानी दिल्ली, कोलकाता और मुंबई हैं। सूची में दिल्ली पहले नंबर पर है। यहां का एक्यूआई 254 है, जिससे दिल्ली पूरी दुनिया में सबसे प्रदूषित शहर है। इसके बाद रैंकिंग में चौथे स्थान पर 216 एक्यूआई के साथ कोलकाता है। इसके बाद दसवें स्थान पर मुंबई है, जहां एक्यूआई 155 रिकॉर्ड किया गया। हाल ही में कानपुर में सात दिन में तीन मौतें सांस लेने में दिक्कतों के चलते हो चुकी हैं। वहीं मेरठ में एक युवक को तेज बुखार आया और रेस्पिरेटरी सिस्टम फेल हो गया। नतीजा युवक की अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई। डॉक्टरों का मानना है कि पॉल्यूशन ने फेफड़ों में ऑक्सीजन का लेवल घटा दिया है। पॉल्यूशन से फेफड़ों की नलियां सिकुड़ चुकी हैं। ऑक्सीजन की इनहेलिंग धीरे-धीरे घट रही है। ओपीडी और क्रिटिकल केयर यूनिट में आ रहे मरीजों की जांच में ऑक्सीजन लेवल ठीक नहीं मिल रहा है।
चीन के गुआंगडोंग प्रांत में प्रदूषण से होने वाली प्रीमैच्योर डिलीवरी को लेकर एक शोध हुआ। इस शोध में शामिल 687 महिलाओं को प्रीमैच्योर डिलीवरी हुई थी और 1097 महिलाओं को कम वजन वाले बच्चे हुए थे। इनकी तुलना 1766 हेल्दी बर्थ वाली महिलाओं के साथ की गई। गौर करने वाली बात यह है कि चीन के इस प्रांत में पूरे देश के औसत से कम प्रदूषण रहता है। चीन में भी उत्तर भारत की तरह सितंबर-अक्टूबर से वायु प्रदूषण बढ़ना शुरू होता है और गर्मियों में कम होता है। इस शोध में यह पता चला कि प्रेगनेंसी के पहले और आखिरी महीने में महिलाओं और गर्भस्थ शिशु को प्रदूषण से सबसे ज्यादा नुकसान होता है। वहीं अमेरिका में होने वाले कुल प्रीमैच्योर बर्थ में तीन फीसदी की वजह प्रदूषण होता है। ऐसे बच्चों की संख्या 16 हजार है। प्लोस मैगजीन के मुताबिक, दुनिया भर में करीब 60 लाख बच्चे प्रदूषण की वजह से समय से पहले जन्म ले रहे हैं। इनमें से आधे बच्चे अंडरवेट यानी कम वजन के हैं। अजन्मे शिशु के लिए सबसे सुरक्षित स्थान होता है मां की कोख, लेकिन दिल्ली-एनसीआर सहित पूरे उत्तर प्रदेश में वायु प्रदूषण से मां की कोख में पल रहे शिशु भी सुरक्षित नहीं है। बढ़ता प्रदूषण बुजुर्गों और छोटे बच्चों के साथ अजन्मे बच्चों पर भी असर डाल रहा है। यही वजह है कि डॉक्टर इस जहरीली हवा में गर्भवती महिलाओं को बाहर निकलने से रोक रहे हैं। खासतौर पर गर्भावस्था के शुरुआती और आखिरी समय में महिलाओं को घर में ही रहने को कहा जा रहा है। अधिकांश डॉक्टरों ने गर्भवती महिलाओं के लिए ऑनलाइन कंसल्टेंसी शुरू कर दी है। जरूरत पड़ने पर ही महिलाओं को चेकअप के लिए अस्पताल बुलाया जा रहा है।

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