मुद्दा: पूर्व चेयरमैन की ये टिप्पणियां सरकार की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाती हैं…

मुद्दा: पूर्व चेयरमैन की ये टिप्पणियां सरकार की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाती हैं…
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हाल ही में यह चौंकाने वाली खबर आई कि तकरीबन 120 वैज्ञानिकों और तकनीक-कर्मियों ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) से इस्तीफा दे दिया, अथवा समय से पहले अवकाश ग्रहण कर लिया है। इनमें गगनयान, चंद्रयान-3 और स्पाडेक्स जैसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय अभियानों से जुड़े वैज्ञानिक शामिल बताए गए। तब से इसरो से वैज्ञानिकों के “मोहभंग” को लेकर कई तरह के कयास लगाए जाते रहे हैं। बहरहाल, केंद्र का रुख उलटबासी की तरह रहा। वैज्ञानिकों के असंतोष के कारणों का पता लगाने का इरादा दिखाने के बजाय सरकार ने सख्ती का पैगाम दिया। अंतरिक्ष विभाग ने वैज्ञानिकों के इस्तीफे और स्वैच्छिक अवकाश-ग्रहण पर रोक लगा दी।
बहरहाल, इसरो के पूर्व चेयरमैन जी. माधवन नायर ने अब एक मीडिया इंटरव्यू में वो राज़ बताया है, जिस पर कयास लग रहे थे। उन्होंने कहा कि इसरो में ‘ब्यूरोक्रेटाइजेशन’ यानी वैज्ञानिकों के ऊपर नौकरशाहों का शिकंजा कसने की प्रवृत्ति बढ़ी है। यह वैज्ञानिकों के पलायन का प्रमुख कारण बना है। नायर ने दो टूक कहा कि वैज्ञानिक केवल पैसों के लिए इसरो छोड़ कर नहीं जा रहे, बल्कि संस्थान में बढ़ती नौकरशाही और प्रशासनिक जटिलताएं इसकी बड़ी वजह हैं। नायर ने ये सुझाव भी दिया है कि अंतरिक्ष आयोग के पूर्ण अधिकारों को बहाल किया जाए और शीर्ष प्रतिभाओं के लिए प्रदर्शन-आधारित इंसेंटिव फिर से शुरू की जाए। इन बातों का अर्थ है कि मौजूदा सरकार ने इन दोनों मामलों में पहले से जारी चलन को पलट दिया है।
नायर ने कहा कि नई संस्थाओं (जैसे इन-स्पेस और एनएसआईएल) के आने से फैसले लेने की प्रक्रिया जटिल हुई है, जिसे फिर से सरल और प्रभावी बनाने की जरूरत है। नायर ने चेतावनी दी है कि बाहरी एजेंसियों की ओर से इसरो के अत्यधिक प्रशिक्षित कर्मियों और समृद्ध संसाधनों को अपनी ओर खींचने का जबरदस्त दबाव है, जिससे अंतरिक्ष कार्यक्रम को गंभीर नुकसान पहुंचेगा। जिस समय निजी क्षेत्र ने भी भारत के अंतरिक्ष अभियान क्षेत्र में कदम रखा है, ऐसी टिप्पणियों का खास महत्त्व हो जाता है। ये टिप्पणियां सरकार की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाती हैं। क्या केंद्र इस बारे में देश को भरोसे में लेगा?

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