मुद्दा: आखिर दुनिया के 85 देशों को प्रभावित कर रहे विध्वंसक युद्ध का समापन कैसे होगा?

मुद्दा: आखिर दुनिया के 85 देशों को प्रभावित कर रहे विध्वंसक युद्ध का समापन कैसे होगा?
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   अब यह सवाल इतना मौजू नहीं है कि ईरान युद्ध कितना लंबा चलेगा? कब समाप्त होगा? अब यह बुनियादी सवाल और गहरी चिंता है कि युद्ध कैसे समाप्त होगा? युद्ध के 20 दिन गुजर चुके हैं। अमरीका-इजरायल के हवाई हमलों ने ईरान को ‘कब्रिस्तान-सा’ बना दिया है। ईरान ने भी इजरायल की राजधानी तेल अवीव को ‘खंडहर’ में तबदील कर दिया है। धार्मिक शहर येरुशलम भी छलनी हुआ है। इजरायल की 12,000 से अधिक इमारतें या तो क्षतिग्रस्त हुई हैं अथवा जमींदोज होकर ‘मिट्टी-मलबा’ हो चुकी हैं। अब लगता है कि ईरान या तो खुद मिट्टी हो जाएगा अथवा इजरायल का अस्तित्व भी मिटा कर रहेगा! दोनों देशों में ‘चरम’ की स्थिति है। कोई भी रात ‘कयामत की रात’ साबित हो सकती है। ईरान ने खाड़ी देशों की सम्पन्नता के प्रतीक तेल ठिकानों, क्षेत्रों और रिफाइनरियों को जला कर खाक कर दिया है। उन देशों ने उत्पादन या तो बंद कर दिए हैं अथवा बहुत कम करने पड़े हैं। हवाई अड्डे तबाह, बर्बाद कर दिए गए हैं। पर्यटन को लेकर 60 करोड़ डॉलर प्रतिदिन का नुकसान झेलना पड़ रहा है। खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था 12-15 फीसदी गिर चुकी है। डॉलर बुरी तरह पिट रहा है, नतीजतन अमरीकी अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हुई है। अमरीका को अभी तक करीब 17 अरब डॉलर युद्ध पर खर्च करने पड़े हैं, लिहाजा वहां भी असंतोष और आक्रोश है। ईरान लगभग तबाह, ध्वस्त हो चुका है। उसके 56 शीर्ष नेताओं की हत्या की जा चुकी है। उनमें ‘सुप्रीम लीडर’ खामेनेई और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के प्रमुख लारिजानी भी शामिल हैं। अब इजरायल ने नए ‘सुप्रीम लीडर’ मुज्तबा खामेनेई का भी ‘डेथ वारंट’ जारी कर दिया है। ईरान के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, मुख्य न्यायाधीश, विदेश मंत्री और संसद के स्पीकर आदि को भी ‘टारगेट’ तय कर लिया गया है। ईरान की ऐतिहासिक इमारतें, रिहायशी घर और 200 से अधिक अस्पताल ‘मिट्टी-मलबा’ हो चुके हैं। करीब 1500 लोग मारे जा चुके हैं और 12,000 से अधिक घायल हैं। करीब 32 लाख लोग बेघर हो चुके हैं। यह संयुक्त राष्ट्र रिफ्यूजी एजेंसी की रपट है।
विश्व खाद्य कार्यक्रम ने कहा है कि यदि युद्ध जून तक जारी रहा, तो करीब 4.5 करोड़ लोग भुखमरी का सामना करेंगे। तेल-संकट के कारण ऐसा होगा। इनके बावजूद ईरान में पुरानी हुकूमत कायम है, उसके परमाणु कार्यक्रम पहाड़ों के भीतर 400 मीटर की गहराई में बदस्तूर जारी हैं, समुद्र के नीचे ईरान का ‘मिसाइल शहर’ अब भी जिंदा है और वहां से मिसाइल हमले कर दुश्मन को क्षत-विक्षत किया जा रहा है। ईरान का दावा है कि उसने 200 से अधिक अमरीकी सैनिकों को मारा है, करीब 3000 घायल हैं, करीब 150 मिसाइल लॉन्चर ध्वस्त किए हैं और डिफेंस, रडार सिस्टम विनष्ट किए हैं। अमरीकी सैन्य अहंकार के प्रतीक ‘जेराल्ड फोर्ड’ और ‘लिंकन’ जैसे विमानवाहक युद्धपोतों को अमरीका लौटना पड़ा है। राष्ट्रपति ट्रंप के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहे जॉन बोल्टन का कहना है कि ट्रंप ईरान युद्ध में बुरी तरह फंस गए हैं। युद्ध उनके लिए ‘गले की फांस’ बन चुका है। युद्ध से बाहर निकलने का रास्ता दिख नहीं रहा है। विडंबना है कि ट्रंप इजरायल की लड़ाई लड़ने को बाध्य हैं। ट्रंप के प्रशासनिक ढांचे में ही अंतर्विरोध उभरने लगे हैं। ‘राष्ट्रीय आतंकवाद-रोधी विभाग’ के निदेशक जो केंट ने यह कहते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया है कि ईरान से अमरीका को कोई तात्कालिक खतरा नहीं था, लिहाजा यह युद्ध समझ के परे है। नाटो और यूरोपीय देशों ने भी राष्ट्रपति ट्रंप को ठेंगा दिखाते हुए युद्ध में शामिल होने या होर्मुज में जहाज भेजने से इंकार कर दिया है। यह इंकार ट्रंप के अहंकार को खारिज करता है। बहरहाल जिस युद्ध से भारत, जापान, चीन समेत विश्व के 85 देश प्रभावित हो रहे हैं, उस युद्ध का समापन कैसे होगा? यह सवाल सभी के लिए अनुत्तरित है। कई स्तरों पर विश्व नेता आपस में बातचीत कर रहे हैं। अरब-इस्लामी देशों के विदेश मंत्रियों की भी बैठक हुई है, लेकिन ईरान अब भी युद्धविराम को तैयार नहीं है। इजरायल का बहुत पुराना मंसूबा है कि ईरान को खत्म करना है। दुनिया क्या करेगी? भारत का पक्ष यह है कि यह समय युद्ध का नहीं है। हमने हमेशा शांति की वकालत की है। रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर भी भारत ने शांति का पक्ष लिया है। अब ईरान-इजरायल लड़ाई को लेकर भी भारत यही चाहता है कि समस्या को बातचीत से सुलझाया जाए। विध्वंसक रास्ते से शांति कायम नहीं हो सकती। युद्ध में दोनों पक्षों की हानि ही होती है।

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