मुद्दा: समझौते के टिकाऊपन पर हमेशा लटकी रहती है राष्ट्रपति ट्रंप के मूड की तलवार

मुद्दा: समझौते के टिकाऊपन पर हमेशा लटकी रहती है राष्ट्रपति ट्रंप के मूड की तलवार
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अमेरिका ने अब भारत से सौर ऊर्जा से संबंधित पाट-पुर्जों के आयात पर 126 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया है। इसे भारत के फूलते-फलते सौर उद्योग पर घातक प्रहार समझा गया है। डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन ने ये कदम उस समय उठाया, जब अमेरिका में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद टैरिफ वॉर के स्वरूप को लेकर अनिश्चय है। ट्रंप ने जिस कानून के तहत दंडात्मक आयात शुल्क लगाए थे, सुप्रीम कोर्ट ने उसे अवैध ठहरा दिया। उसके बाद ट्रंप ने दूसरे कानून के तहत सभी देशों पर दस फीसदी टैरिफ लगाया। बाद में कहा गया कि वे इसे 15 फीसदी तक ले जाएंगे। अब बताया गया है कि आम टैरिफ 10 फीसदी रहेगा और ट्रंप बाकी पांच फीसदी का इस्तेमाल विभिन्न देशों के रुख के हिसाब से करेंगे।
इस बीच अलग-अलग उत्पादों (मसलन स्टील) पर लगाए गए शुल्क जारी रहेंगे और नए शुल्क भी ट्रंप लगाते रहेंगे, जैसाकि अब उन्होंने सौर ऊर्जा से संबंधित पाट-पुर्जों पर लगाया है। ऐसे में भारत सहित हर देश के सामने यह प्रश्न है कि ट्रंप प्रशासन से द्विपक्षीय व्यापार समझौता करने का क्या औचित्य है? किसी समझौते के तहत हुई लेनदेन से देश के अधिकांश उद्योगों और अर्थव्यवस्था के ज्यादातर क्षेत्रों को लाभ ना हो रहा हो, तो वैसा समझौता करने की ललक क्यों दिखाई जानी चाहिए? मुद्दा यह भी है कि इस दौर में अमेरिका के साथ हुए समझौते के टिकाऊपन पर हमेशा ट्रंप के मूड की तलवार लटकी रहती है।
फिर अमेरिका के भीतर स्थितियां अस्थिर हैं। ट्रंप जो कर रहे हैं, उस पर वहां राजनीतिक आम सहमति नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णय जाहिर हुआ है कि शासन की सभी संस्थाओं के बीच उन कदमों की वैधानिकता पर आम समझ का अभाव है। इसलिए भारत सरकार को ताजा स्थितियों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। अभी भी समय है कि वह पहले इस बारे में देश को भरोसे में ले और राजनीतिक आम सहमति तैयार करे। वरना, समझौते के प्रति उसके उत्साह पर सवाल उठते रहेंगे। उसे याद रखना चाहिए कि ट्रंप के हर मूडी एक्शन के साथ ऐसे सवाल और संगीन होते जाएंगे।

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