मुद्दा: सांप्रदायिक भावनाओं के रहते थोपी गई एकता कारगर नहीं हो सकती

मुद्दा: सांप्रदायिक भावनाओं के रहते थोपी गई एकता कारगर नहीं हो सकती
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पिछले महीने मणिपुर चूराचंदपुर में 31 वर्षीय मयंगलम्बम सिंह का अपहरण कर हत्या कर दी गई थी, जब वे अपनी मंगेतर से मिलने गए थे। मंगेतर कुकी-जो समुदाय की थी। उस हृदय-विदारक घटनाक्रम में इक_ी भीड़ ने युवती को वहां से जाने दिया। उसके बाद मयंगलम्बम सिंह को मार डाला गया। हत्यारों ने दया की भीख मांगते उस व्यक्ति का वीडियो बनाया और उसे सोशल मीडिया पर प्रचारित किया। इस घटना से जाहिर हुआ था कि पौने तीन साल से जारी हिंसा ने मैतेई और कुकी समुदायों में किस हद तक दुराव पैदा किया है।
उस घटना के बाद मीडिया में आई रिपोर्टों से संकेत मिला है कि सांप्रदायिक नफरत का ये जहर किस हद तक फैला चुका है। असर इतना घातक है कि अब विवाहित मैतई और कुकी दंपती अपने को मुसीबत में पा रहे हैं। ऐसे कई सामने आए मामले हैं, जिनमें ऐसे दंपतियों पर तलाक लेने का दबाव उनके समुदाय के लोगों ने बनाया हैं। उनमें कई दंपतियों की कई संतानें भी हैं। कुछ मामले तो ऐसे हैं, जिनमें पति- पत्नी हिंसा भड़कने के बाद से अलग रहने को मजबूर हैं। हैरतअंगेज है कि राजनीतिक दलों को समाज में उभरी ऐसी विभाजक प्रवृत्तियों की फिक्र नहीं है। इन हालात को नजरअंदाज करते हुए भारतीय जनता पार्टी ने इस महीने मणिपुर में नई सरकार बनाई। उसके बाद से राज्य में हिंसा का नया दौर आया हुआ है।
चूराचांदपुर, उखरुल और अन्य कुकी बहुल इलाकों में आगजनी, पथराव, पुलिस से झड़प आदि जैसी अनेक घटनाएं हुई हैं। कुकी-जो समुदाय के लोग अपनी बहुलता वाले इलाको को केंद्र शासित प्रदेश बनाने की मांग कर रहे हैं। यानी वे मणिपुर का हिस्सा नहीं रहना चाहते, जिसमें मैतेई बहुसंख्यक हैं। राजनेताओं को थोड़े समय के लिए स्वार्थ से उठ कर इस समस्या पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। उन्हें समझना चाहिए कि जब समाज में सांप्रदायिक भावनाओं के कारण व्यक्तिगत रिश्ते तनाव में आ गए हों, तब ऊपर से थोपी गई राजनीतिक एकता कारगर नहीं हो सकती। अत: जरूरत पहले सामाजिक दुराव खत्म करने की है। इसे जितना नजरअंदाज किया जाएगा, स्थितियां उतनी ही विकट होती जाएंगी।

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