संकेत: मध्य हिमालय में पर्यावरणीय संकट का संकेत, जनवरी में ही खिल गया बुरांश
शीतकालीन ठंड में लगातार आ रही गिरावट,एक दशक में सर्दियों के औसत तापमान में निरंतर वृद्धि दर्ज
रुद्रप्रयाग। रानीगढ़ पट्टी स्थित लाटू देवता वन रेंज में मध्य हिमालय का अत्यंत महत्वपूर्ण पादप बुरांश इस वर्ष असामान्य रूप से जनवरी माह में ही खिल गया है। सामान्यतः मार्चदृअप्रैल में खिलने वाला यह पुष्प समय से पहले खिलकर पर्यावरणीय असंतुलन और तेजी से बदलते जलवायु पैटर्न की गंभीर चेतावनी दे रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, इसका प्रमुख कारण मध्य हिमालय में लगातार बढ़ता तापमान, नवंबर से वर्षा का न होना और शीतकालीन ठंड में लगातार आ रही गिरावट है। पिछले एक दशक में सर्दियों के औसत तापमान में निरंतर वृद्धि दर्ज की गई है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में विंटर वार्मिंग ट्रेंड कहा जाता है। उत्तराखंड का राज्य वृक्ष बुरांश 1500 से 3600 मीटर की ऊंचाई पर पाया जाने वाला सदाबहार वृक्ष है, जो अपने चमकीले लाल फूलों, औषधीय गुणों और पारंपरिक महत्व के लिए जाना जाता है। इससे शरबत, दवाइयां और कई आयुर्वेदिक उत्पाद तैयार किए जाते हैं। हिमालयी समाज में बुरांश को ऋतु चक्र और प्राकृतिक संतुलन का प्रतीक माना जाता है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि समय से पहले फूल आना “फिनोलॉजिकल मिसमैच” की स्थिति को दर्शाता है। इसका अर्थ है, पौधों के जीवन चक्र और उनसे जुड़े परागणकर्ता जीवों (कीट, मधुमक्खियां, तितलियां और पक्षी) के जीवन चक्र में तालमेल का टूट जाना।
जनवरी में फूल आने की स्थिति में परागण करने वाले जीव सक्रिय नहीं होते, जिससे परागण विफल हो जाता है। इसका सीधा असर बीजों की गुणवत्ता, अंकुरण और प्राकृतिक पुनर्जनन पर पड़ता है। वायुमंडल में बढ़ती कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा पौधों में प्रकाश संश्लेषण की दर बढ़ा देती है, जिससे असामान्य वृद्धि और समय से पहले प्रजनन की प्रवृत्ति देखी जा रही है। कम वर्षा, हिमपात की अवधि में भारी कमी, लगातार बढ़ती वनाग्नि की घटनाएं और मिट्टी की नमी का खत्म होना हाइड्रोलॉजिकल स्ट्रेस और हार्मोनल असंतुलन को जन्म दे रहे हैं। अस्तित्व बचाने के लिए वनस्पतियां शीघ्र फूलने की ओर बढ़ रही हैं।
लोक मान्यताएं भी दे रही हैं चेतावनी
हिमालयी लोक परंपराओं में बुरांश का समय से पहले खिलना अशुभ संकेत माना जाता है। मान्यता है कि यदि बुरांश माघ महीने में खिल जाए, तो आने वाला वर्ष मौसम की दृष्टि से असंतुलित होता है। इसका प्रभाव अनाज, दालों और फलदार वृक्षों की पैदावार पर पड़ता हैकृफूल और फल गिरने की समस्या बढ़ जाती है। पर्यावरण विशेषज्ञ देव राघवेन्द्र सिंह ने बताया कि वे पिछले एक दशक से मध्य हिमालय की जैव विविधता पर गहन अध्ययन कर रहे हैं। उनके अनुसार, “बुरांश जैसे महत्वपूर्ण पादपों में दिसंबर और जनवरी में फूल आने की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। इससे प्राकृतिक पुनर्जनन कमजोर हो रहा है। आने वाले वर्षों में बीज कमजोर होंगे, अंकुरण घटेगा और बुरांश वनों का घनत्व धीरे-धीरे कम होता जाएगा। परागण विफल होने से पूरी पारिस्थितिकी और खाद्य श्रृंखला प्रभावित होगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि जलवायु परिवर्तन इसका सबसे बड़ा कारण है और यदि समय रहते वैज्ञानिक निगरानी, वन संरक्षण और जलवायु-अनुकूल नीतियां लागू नहीं की गईं, तो मध्य हिमालय का यह महत्वपूर्ण वृक्ष विलुप्ति की ओर बढ़ सकता है।
पर्यावरणविदों का स्पष्ट संदेश
जनवरी में खिला बुरांश केवल एक प्राकृतिक घटना नहीं, बल्कि हिमालयी पारिस्थितिकी के लिए वैज्ञानिक अलार्म है। प्रसिद्ध पर्यावरणविद जगत सिंह जंगली ने कहा कि इसे नजरअंदाज करना भविष्य में और अधिक गर्म सर्दियां, अनियमित वर्षा और विनाशकारी प्राकृतिक आपदाओं को न्योता देना होगा। अब आवश्यकता है तत्काल संरक्षण, गहन शोध और ठोस जलवायु नीति कीकृताकि हिमालय और उसकी जैव विविधता को बचाया जा सके।
