Home उत्तराखंड विभूति: भगवान बद्रीनाथ की आरती के रचेयता थे  मालगुजार ठाकुर धन सिंह...

विभूति: भगवान बद्रीनाथ की आरती के रचेयता थे  मालगुजार ठाकुर धन सिंह बर्त्वाल

185
0
प्राप्त अभिलेखों के अनुसार 29 वर्ष की उम्र में भगवान श्री बद्रीनाथ जी की विश्व विख्यात आरती की रचना उनके द्वारा की गई थी
यूसैक के निदेशक प्रो. महेंद्र प्रताप सिंह बिष्ट, सामाजिक कार्यकर्ता गम्भीर सिंह बिष्ट व आचार्य कृष्णानन्द नौटियाल ने इसकी मान्यता दिलाने में किया अमूल्य सहयोग 
सतेन्द्र सिंह बिष्ट
रुद्रप्रयाग-  ‘बहूनि सन्ति तीर्थानि, दिविभूमौ रसासु च। बदरी सदृशं तीर्थ, न भूतो न भविष्यति।’
अर्थात धरती पर हर दिशा और स्थान में बहुत से तीर्थ हैं लेकिन बदरीनाथ जैसा तीर्थ न तो पहले कभी था और न भविष्य में होगा। इस वर्ष कृष्ण अष्टमी तिथि धनिष्ठा नक्षत्र में श्री बदरीनाथ धाम के कपाट खोले गए। अधिकांश लोगों को संभवतः यह जानकारी नहीं हो कि श्री बद्रीनाथ भगवान की मंत्रमुग्ध कर देनेवाली आरती “पवन मंद सुगंध शीतल, हेम मंदिर शोभितम्। निकट गंगा बहत निर्मल, श्री बदरीनाथ विश्वम्भरम्” की रचना मालगुजार स्व. ठाकुर धन सिंह बर्त्वाल जी के द्वारा की गयी थी। स्व. बर्त्वाल रुद्रप्रयाग जिले के सतेराखाल स्यूपुरी निवासी थे और सतेरा गढ़ी के मालगुजार थे।
स्व.ठाकुर धन सिंह बर्त्वाल का पैतृक घर
तत्कालीन सरकारी अभिलेखों के अनुसार उनका जन्म 1852 में हुआ था।उनके पिता का नाम ठाकुर जोत सिंह बर्त्वाल था। उनका जीवन बेहद ही कष्टमयी रहा था। बचपन में ही माता पिता की मृत्यु व गरीबी के बाद भी अध्ययन करने की लालसा उनके मन में थी। आज भी उनकी गणित प्रकाश व ज्ञान चालीसा की किताबें मौजूद हैं। बचपन से ही वे भगवान नारायण व मां राजराजेश्वरी के अनन्य भक्त थे। प्राप्त अभिलेखों के अनुसार 29 वर्ष की उम्र में माघ 10 गते संवत 1938 ( सन 1881) में भगवान श्री बद्रीनाथ जी की विश्व विख्यात आरती की रचना उनके द्वारा की गयी थी। इस मूल आरती में 11 पद हैं। आरती का प्रारंभ “अगम पंथ अपार गमिता श्री ब्रहम नारद जी सेवितम, श्री बद्रीनाथ जी के हिमाल जल थल निर्मल मानसरीपुरम” पंक्तियों से होता है।
34 वर्ष की उम्र में 4 गते वैसाख 1886 में उनका विवाह उत्तरकाशी जनपद के थाती धनारी में परमार राजपूतों की कन्या से हुआ था।
लेकिन सर्वविदित है कि इस आरती के रचनाकार के बारे में अलग-अलग मत लोगों के बीच रहे। लेकिन गत वर्ष  मूल आरती की पाण्डुलिपि की चर्चा और खोज हुई। उसके बाद आरती के लेखक की सच्चाई सामने आयी तो पहाड़ के इस विद्वान के बारे में पूरी दुनिया ने जाना।
स्व.धन  सिंह बर्त्वाल के परपौत्र महेंद्र सिंह बर्त्वाल कहते हैं कि सच्चाई एक न एक दिन दुनिया के सामने आनी थी। काफी वर्ष पहले उन्हें अपने घर में आरती की मूल पाण्डुलिपि मिली थी। जिसका गहनता से हर बिन्दु पर गहन अध्ययन किया गया तो पाया कि यह आरती ही भगवान श्री बद्रीनाथ जी की मूल आरती है। कार्बन डेटिंग, वैज्ञानिक प्रमाणिकता के साथ ही श्री बद्री केदार मन्दिर समिति द्वारा भी मान्यता प्रदान करने पर स्व ठाकुर धन सिंह बर्त्वाल के परपौत्र महेंद्र सिंह बर्त्वाल ने सभी का आभार प्रकट किया।
इस कार्य में यूसैक के निदेशक प्रो. महेंद्र प्रताप सिंह बिष्ट, सामाजिक कार्यकर्ता गम्भीर सिंह बिष्ट तथा आचार्य कृष्णानन्द नौटियाल का अमूल्य सहयोग रहा।