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प्रतिक्रिया: कोरोना संक्रमित मरीज को भर्ती न करने के आरोप का एम्स प्रशासन ने किया खंडन, खबर को बताया निराधार

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सतेंद्र सिंह चौहान
 ऋषिकेश- बुधवार 5 अगस्त को कुछ स्थानीय समाचार पत्रों द्वारा एक बीमार व्यक्ति को एम्स में एडमिट नहीं किए जाने से उसकी मृत्यु संबंधी समाचार प्रकाशित किया गया है। जिसमें तर्क दिया गया है कि उक्त व्यक्ति को राज्य सरकार के स्थानीय राजकीय चिकित्सालय द्वारा अपने यहां दाखिल नहीं किया गया और उसे बिना रेफर किए एम्स भेज दिया गया। इस बाबत एम्स प्रशासन की ओर से यह स्पष्ट करना है कि सामान्य जन, राज्य के स्थानीय अस्पताल व मीडियाकर्मी सबसे पहले एम्स की महत्ता को समझने का प्रयास करें। सर्वविदित है कि एम्स संस्थान टर्सरी केयर सेंटर है। जहां गंभीर प्रकृति के मरीजों, ट्रॉमा पेशेंट को प्राथमिकता से उपचार दिया जाता है। कोविडकाल में जब अपनी कर्तव्यविमुखता के चलते राज्य के लगभग सभी राजकीय और निजी अस्पतालों द्वारा अपनी ओपीडी व इमरजेंसी सेवाएं बंद कर दी थीं, तब भी एम्स में ट्रॉमा सेंटर, इमरजेंसी सेवाएं निर्बाधगति से 24 घंटे जारी रहीं। इतना ही नहीं दूर दराज के मरीजों के परामर्श व फॉलोअप पेशेंट्स के लिए कोविड स्क्रीनिंग ओपीडी के साथ साथ टेलिमेडिसिन वर्चुअल ओपीडी की अतिरिक्त सेवाएं भी शुरू की गईं, जिससे मरीजों को ​चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई जा सके। उक्त समाचार में तर्क दिया गया है कि उक्त मरीज के साथ कोई तीमारदार नहीं था, लिहाजा राजकीय अस्पताल के साथ साथ एम्स ऋषिकेश द्वारा भी उसे अपने यहां दाखिल कर उपचार नहीं दिया गया। तो यह तर्क भी सिरे से खारिज किया जाता है। जो लोग वास्तविक तथ्यों से अनविज्ञ हों अथवा एम्स की कार्यप्रणाली से नावाकिफ हों, ऐसे लोगों के संज्ञान के लिए बता दें कि कोरोना काल में ऐसे मरीजों की संख्या एक सैकड़ा से अधिक है, जो लावारिस अथवा बिना तीमारदार के भी एम्स में न सिर्फ भर्ती किए गए बल्कि उनके पूर्णरूप से स्वस्थ होने पर उन्हें उनके द्वारा बताए गए निर्धारित पते पर एम्स की ओर से अपनी निजी एंबुलेंस सेवा से गंतव्य तक छोड़ा गया। अकेले जुलाई माह में ऐसे लावारिस मरीज जिनके साथ कोई तीमारदार नहीं था व उन्हें एम्स द्वारा एडमिट कर उपचार दिया गया उनकी संख्या 17 है। कहना है कि एम्स चूंकि टर्सरी केयर सेंटर है, लिहाजा सामान्य मरीजों को एडमिट कर उन्हें उपचार देने की जिम्मेदारी राज्य सरकार के एसपीएस राजकीय चिकित्सालय ​ऋषिकेश की बनती है। राजकीय अस्पताल प्रशासन अपनी इस जिम्मेदारी से बच नहीं सकता कि मरीज के साथ कोई तीमारदार नहीं था लिहाजा उसे अस्पताल में दाखिला नहीं दिया गया और बिना ऑफिशियल डाक्यूमेंटेशन रेफर पेपर के उसे एम्स अस्पताल भेजा गया और अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हुए उक्त घटना का सारा दोष एम्स पर मंढ दिया जाए। राजकीय अस्पताल प्रशासन के इस गैरजिम्मेदाराना रवैये को यहां नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि वह सामान्य पेशेंट को अपने यहां भर्ती करने की बजाए अधिकांश ऐसे सामान्य मरीजों को भी एम्स के लिए रेफर कर देता है, जिनका उपचार राज्य के अस्पताल में सुलभ है। यदि ऐसा ही किया जाना है व सामान्य मरीज को भी उपचार के लिए एम्स में भेजा जाना है तो फिर सवाल है कि ऐसे अस्पताल व वहां कार्यरत चिकित्सकों का आखिरकार क्या कार्य है। वह किस राजकीय सेवा व चिकित्सकीय धर्म के लिए वहां तैनात किए गए हैं। लिहाजा सामान्य मरीजों को अपने यहां लेने व उन्हें समुचित उपचार देने की सबसे पहले राजकीय अस्पताल की ही नैतिक जिम्मेदारी है।