Home देश दृष्टिपात:  ये मौत बहुत कुछ सोचने को बाध्य करती है….

दृष्टिपात:  ये मौत बहुत कुछ सोचने को बाध्य करती है….

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पिछले साल 31 जुलाई को कैफे कॉफी डे (सीसीडी) के संस्थापक वीजी सिद्धार्थ का शव कर्नाटक में संदिग्ध परिस्थितियों में मिलने की घटना ने देश के कॉर्पोरेट सेक्टर में कर्ज के संकटों को उजागर किया था, क्योंकि सिद्धार्थ ने मृत्यु पूर्व लिखे एक पत्र में अपने संघर्ष, नकदी के संकट और ऋणदाताओं के भारी दबाव का जिक्र किया था।
लगभग वैसी ही परिस्थितियों में मेरठ के प्रतिष्ठित आनंद हॉस्पिटल के मालिक हरिओम आनंद की आज (शनिवार) दोपहर बाद अकाल मृत्यु हो गई है।
कुछ लोगों का कहना है कि आनंद की मृत्यु सल्फास खाने से हुई है। हालांकि इस बात की पुष्टि नहीं हो पाई है और पुलिस जांच कर रही है। आनंद अस्पताल के मैनेजर मनीष पंडित ने हरिओम आनंद की मौत की पुष्टि करते हुए उनकी आत्महत्या से इनकार किया है।
हरिओम आनंद इससे पहले पिछले साल मई में मेरठ के शास्त्रीनगर स्थित अपनी कोठी की छत से कूदकर खुदकुशी का प्रयास कर चुके थे। जिससे उनके हाथ में फ्रैक्चर और रीढ़ की हड्डी में चोट आई थी। उन्हें किसी तरह बचा लिया गया और वे काफी समय तक अस्पताल में भर्ती रहे थे।
बताया गया है कि आनंद अस्पताल पर कई तरह की देनदारियां थीं और वे काफी तनाव में चल रहे थे। इसी कारण लेनदारों से उनका पूर्व में कई बार विवाद हो चुके हैं। यहां तक कि उनकी बेटी को भी ऋण वसूली वालों ने पिस्टल दिखाकर धमकाया भी था।
उनकी बेटी मानसी आनंद का कहना है कि उनके पिता हरिओम आनंद तनाव में थे। पत्नी मीना आनंद ने बताया कि घर में परिजन जब एक जगह बैठे हुए थे, तब उस दौरान भी वे काफी तनाव में थे।
आज ( शनिवार ) उन्होंने अपने ही घर में रखा सल्फास खा लिया। इसके बाद उन्हें आनंद अस्पताल में भर्ती कराया गया। जहां उपचार के दौरान उनकी मौत हो गई।
इस पूरे मामले के पीछे भारी कर्ज में डूबना बताया जा रहा है जो लगभग 400 करोड़ रुपए है।
हरिओम आनंद कभी सुभारती ग्रुप के कर्ताधर्ताओं में से एक थे लेकिन सुभारती के एक मालिक अतुल कृष्ण से अनबन के बाद हरिओम आनंद अपना हिस्सा लेकर अलग हो गए और आनंद हास्पिटल की स्थापना की।
कुछ लोगों का कहना है कि उन्होंने बाजार से बहुत ज्यादा पैसा ब्याज पर ले रखा था।
नोटबंदी, जीएसटी, लॉकडाउन के कारण उनके हास्पिटल बिजनेस की कमर टूट गई। पैसे का फ्लो कम हो गया। कर्जा देने वाले वसूली के लिए गर्दन पर सवार रहने लगे। हरिओम आनंद खुद उदार स्वभाव के थे और सबकी मदद करने में विश्वास रखते थे। इसलिए वे पैसे कम ही बचा पाते थे। बढ़ती देनदारी और कर्ज लौटाने के बढ़ते दबाव के डिप्रेशन में उन्होंने पहले छत से कूदकर जान देने की कोशिश की थी और अब उनके जहर खाकर मर जाने की दुखद खबर आई है।
मृत्यु अटल है, शाश्वत सत्य है, यही संसार का इकलौता सच है। यहां कोई नहीं बचा है और न बचेगा लेकिन पिछले एक दशक से भी अधिक समय से देश में लोग जिस तरह मर रहे हैं, उसमें आत्महत्या करने वाले लाखों की संख्या में हैं। जिनमें से अधिकांश लोगों ने व्यवस्था जनित कारणों से मौत को गले लगाया है और यह अत्यंत चिंताजनक है कि मोदी शासन के इन छः सालों में इन आंकड़ों में तेजी आई है। व्यवस्था और ऋणभार से दुखी लोगों में अब मजदूर और किसान ही नहीं बल्कि अपना रोजगार खो चुके युवा, छोटे-छोटे व्यापारी ही नहीं बल्कि कॉरपोरेट व्यवसायी तक शामिल हैं। यह एक सोचनीय विषय है और इस पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है।
( श्याम सिंह रावत की फेसबुक वाल से)