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​आवाज़: आशा वर्करों के समर्थन में जिला मुख्यालय पर किया प्रदर्शन, एसडीएम के जरिए मुख्यमंत्री को  भेजा ज्ञापन 

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देहरादून(संवाददाता)-
स्वास्थ्य सेवाओं को लोगों तक पहुंचाने के लिए अग्रिम मोर्चे पर बिना संसाधनों के डटी हुई आशा वर्कर्स  उत्तराखंड शासन की बेरुखी और उपेक्षा का शिकार हैं। चंपावत में 250 आशाओं को सेवा से हटा दिया गया है और रुद्रपुर में भी ऐसी तैयारी चल रही है।  इस तरह के आरोप  लगाते हुए राज्य भर  में वाम-जनवादी पार्टियों ने प्रदर्शन किया और प्रदेश सरकार को ज्ञापन भेजा। देहरादून में भी कलेक्टरेट में प्रदर्शन करके मुख्यमंत्री को   ज्ञापन भेजा गया। प्रदर्शन में सीपीएम राज्य सचिव राजेन्द्रसिंह नेगी, सीपीआई राज्य सचिव समर भण्डारी, सीपीआई माले के गढ़वाल सचिव इंद्रेश मैखुरी, किसान सभा के सुरेंद्र सिंह सजवाण, राजेन्द्र पुरोहित, अनन्त आकाश, बिक्रम पुण्डीर, शिवा दुबे के अलावा बड़ी संख्या में आशा वर्कर शामिल थीं ।
मुख्यमंत्री को प्रेषित ज्ञापन-
महोदय,
आशाओं ने हमेशा ही स्वास्थ्य विभाग द्वारा निर्धारित किये गए सारे कार्य  पूरी निष्ठा से किये हैं, यहां तक कि कोरोना महामारी और लॉकडाउन में भी सारे काम आशाएँ कर रही हैं लेकिन बिना मानदेय, बिना लॉकडाउन भत्ता, बिना कर्मचारी का दर्जा पाए आशाएँ कैसे और कब तक काम करेंगी?महोदय, कोरोना लॉकडाउन काल में आशाओं ने फ्रंट लाइन वर्कर्स की भूमिका का निर्वहन बखूबी अपनी जान को जोखिम में डालकर भी किया है लेकिन उसके लिए उनको कोई भी भत्ता नहीं दिया गया है, बल्कि इसके ठीक उलट अपने काम का दाम मांगने वाली आशाओं को बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है।महोदय, आशाओं को मातृ-शिशु मृत्यु दर को कम करने के लिए नियुक्त किया गया था लेकिन आशाओं पर विभिन्न सर्वे और काम का बोझ तो लगातार बढ़ाया गया है लेकिन उसका भुगतान नहीं किया जाता। यदि काम बढ़ाना है तो उसका पैसा उसी हिसाब से दिया जाना चाहिए।महोदय, आशाओं के सवालों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करना तो दूर रहा अपनी न्यायसंगत मांगों को उठाने वाली आशाओं के खिलाफ कार्यवाही की जा रही है। चम्पावत के मुख्य चिकित्साधिकारी द्वारा 264 आशाओं को निकालने के आदेश जारी किए गए हैं और उधमसिंहनगर जिले में भी ऐसी आशाओं की लिस्ट तैयार हो रही है। अन्य जिलों में भी आशाओं को निकालने की लिस्ट तैयार करने की बात सामने आ रही है। कोरोना की अग्रिम योद्धा आशाओं को निकालने की यह कार्यवाही बेहद अन्यायपूर्ण व कोरोना योद्धा आशाओं के सम्मान पर चोट है। कोरोना काल में क्वारेन्टीन सेन्टरों में ड्यूटी से लेकर कोरोना मरीजों की लिस्ट तैयार करने, कोरोना के बारे में सरकार के जागरूकता अभियान में सबसे आगे रहकर भागीदारी करने वाली आशाओं को सम्मान और सम्मानजनक वेतन देने का प्रस्ताव लाने के बजाय उनको धमकी देने और निकालने की कार्यवाही बेहद शर्मनाक है।

उत्तराखंड की वामपंथी पार्टियां आज 6 जुलाई को उत्तराखंड की आशा वर्कर्स की माँगों के समर्थन में और चम्पावत की सभी आशाओं को बिना शर्त काम पर वापस लेने की मांग पर विरोध प्रदर्शन के माध्यम से आपसे मांग करती हैं कि-

1- चम्पावत जिला प्रशासन ने आशाओं को निकालने के आदेश जारी किए हैं और उधमसिंहनगर जिले में भी ऐसी आशाओं की लिस्ट तैयार हो रही है, अन्य जिलों में भी यह बात सामने आ रही है। यह कार्यवाही तत्काल बंद की जाय। चम्पावत जिले की आशाओं को निकालने का आदेश तत्काल बिना शर्त वापस लिया जाय।

2- आशाओं को कोरोना महामारी के समय का लॉकडाउन भत्ता दस हजार रुपए मासिक की दर से भुगतान किया जाय।

3- आशाओं को राज्य कर्मचारी का दर्जा देते हुए 18000 रुपये न्यूनतम वेतन दिया जाय।

4- जब तक मासिक वेतन और कर्मचारी का दर्जा नहीं मिलता तब तक आशाओं को भी अन्य स्कीम वर्कर्स की तरह मासिक मानदेय फिक्स किया जाय।

5-आशाओं को सेवानिवृत्त होने पर पेंशन का प्रावधान किया जाय।

6- सेवा(ड्यूटी) के समय दुर्घटना, हार्ट अटैक या बीमारी होने की स्थिति में आशाओं को सुरक्षा प्रदान करने के लिए नियम बनाया जाय और न्यूनतम दस लाख रुपये मुआवजे का प्रावधान किया जाय।

महोदय उक्त मांगों को लेकर आज 6 जुलाई को वामपंथी पार्टियां भाकपा, माकपा व भाकपा (माले) पूरे राज्य में धरना-प्रदर्शन कर रही हैं। यदि इन मांगों पर तत्काल कार्यवाही नहीं की गई तो हमें आशाओं के साथ उनके समर्थन में आंदोलनात्मक कार्यवाही को बाध्य होना पड़ेगा।

समर भंडारी,
राज्य सचिव,
भाकपा

राजेन्द्र सिंह नेगी,
राज्य सचिव,
माकपा

राजा बहुगुणा,
राज्य सचिव,
भाकपा (माले)

भार्गव चंदोला
एक्टिविस्ट

जयकृत कंडवाल
संयोजक
उत्तराखंड पीपल्स फोरम