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इन दिनों: गांव की धरती पर जिंदगी का फ़लसफ़ा तलाशने की कोशिश में जुटे हैं  ‘हरदा’ 

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हरीश मैखुरी
देहरादून-  उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत वन मैन आर्मी ऐसे ही नहीं कहे जाते हैं। वे उत्तराखंड के उन चंद नेताओं में शुमार हैं, जो पद पर हों न हों उनकी सक्रियता बनी रहती है। जहां भी जाते हैं, उनकी एक अच्छी आदत है, वे इसकी जानकारी भी सार्वजनिक करते रहते हैं। इन दिनों अपने गांव में हैं और गांवों के लिए सस्टेनेबल माॅडल के लिए विकल्प की खोज में हैं। अपने शोशल मीडिया एकाउंट पर उन्होंने लिखा-  ” परसों फिर अपने गांव मोहनरी आया हूं। जौनपुर के कुछ गांवों में जाने के बाद विशेष तौर पर गैड़ के खेतों को देखने व खेती के विषय में लोगों से बातचीत करने के बाद मैं अपने गांव में फिर उस मॉडल को तलाश रहा हूं जो हमारे जौनपुर-रंवाई घाटी के लोग अपने गांव में अपना रहे हैं। मैं पिछले डेढ़ साल से इस प्रयास में लगा हूं। मैं राजनीति से हटकर के कुछ दिन जब अपनी जिंदगी की फिलॉसफी ढूंढने की कोशिश करता हूं तो मुझे उसमें अपना गांव ही नजर आता है और मैं चाहता हूं कि जिस समय तक मेरे हाथ-पांव चल रहे हैं, मैं अपने गांव में अपने लिये यह मॉडल तैयार कर सकूं। लेकिन मुझे कुछ चीजों का साॅल्यूशन मिल रहा है तो दो चीजों का साॅल्यूशन नहीं मिल पा रहा है। जो बड़ी क्रिटिकल हैं। एक तो लोगों की मानसिकता का साॅल्यूशन नहीं मिल पा रहा है और दूसरा जो गांव में ये दैत्य चीड़ घुस आया है, इसका साॅल्यूसन नहीं मिल पा रहा है। इसके लिये मैंने “मेरा वृक्ष-मेरा धन योजना” प्रारंभ की थी, इसको किस तरीके से सस्टेन किया जाय यक्ष प्रश्न है। लेकिन मुझे लगता है कि यह लोगों की मानसिकता के ऊपर छा गया है”
हरीश रावत ने कड़वी सच्चाई भी लिखी है-…. ‘आख़िर राजनीति से एक दिन सबको निवृत होना है। राजनीति हो, राजकीय सेवाएं या कोई दूसरा काम हो, कभी न कभी धरती मां सबको बुलाती है और समय पर हम उसके बुलावे को स्वीकार करके आ जाएं तो हम आने वाली पीढ़ियों के लिये कुछ करके भी जा सकते हैं। आख़िर जिस तरीके से हमारे मां-बाप हमारे लिये बहुत कुछ करके गये, उसी तरह हम भी कुछ करके जाएं।’
इसके दो निहितार्थ निकलते हैं। एक तो, क्या हरीश रावत सक्रिय राजनीति से सन्यास का संकेत दे रहे हैं, या ये कि कोई भी राजनीतिक सन्यासी नहीं होता। शेर बूढ़ा भी हो तो घास नहीं खाता और दूसरा ये कि ग्रामीण क्षेत्रों की प्लानिंग किए बिना उत्तराखंड में विकास की परिकल्पना बेमानी है। निसंदेह,  हरीश रावत ने अपने ढाई साल के कार्यकाल में ग्रामीण क्षेत्रों के विकास पर फोकस करने का प्रयत्न भी किया। ग्रामीण उत्पादों को बाजार देने की योजना भी बनायी। गैरसैंण राजधानी भवन भी इसी दिशा में बढ़ाया गया एक महत्वपूर्ण कदम था। अपनी ऐसी खूबियों और सक्रियता की वजह से ही हरीश रावत सदैव राजनीतिक चर्चाओं में बने रहते हैं। 

(Breakinguttarakhand.com से साभार)