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अनदेखी: हर्षिल घाटी में सेब उत्पादकों में भारी निराशा, कीड़ा लगने से हुई सेब की फसल चौपट

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भानु पी नेगी
उत्तरकाशी- अपने नैसर्गिक सौंदर्य, शुद्ध व स्वास्थ्यवर्धक वातावरण और स्वादिष्ट सेब और राजमा की दाल के लिए प्रसिद्ध उत्तरकाशी जिले की हर्षिल घाटी देश और दुनियां के सैलानियों के लिए विशेष आकर्षण का केन्द्र रहती है।
हर्षिल घाटी में विल्सन नामक अंंग्रेज द्वारा 1864 में पहली बार इस क्षेत्र में सेब का पेड़ रोपा गया था, जो इंग्लैंड से लाया गया था। तब से यहां पर सेब की खेती का प्रचलन हुआ और अब इस घाटी में सेब ही मुख्य फसल है, जो यहां के किसानों की आय का मुख्य जरिया बना हुआ है। लेकिन इस बार जनपद उत्तरकाशी के हर्षिल घाटी के आठ गांवों में सेब की फसल को स्केब, स्केल, पतझड़ आदि का रोग लग गया है। इससे यहां पर सेबों की 50 प्रतिशत से ज्यादा फसल खराब हो चुकी है।सालभर की मेहनत के खराब होने से यहां के किसान काफी मायूस हैंं। किसानों का कहना है कि उद्यान विभाग की लापरवाही से उनकी फसलों को नुकसान पंहुचा है। विभागीय कीटनाशक दवा इतनी घटिया किस्म की है कि उससे एक साधारण कीट भी नहीं मर रहा है। समय पर किसानों को सही कीटनाशक और सेब पर लगने वाले रोगों के बारे में जानकारी मिल जाती तो उनकी सेबों की फसल खराब नहीं होती।

सेेेब की फसल के लिए सबसे मुफीद मानी जाने वाली हर्षिल घाटी के सेब देश और दुनियां में प्रसिद्व हैंं। उचित जलवायु होने के बावजूद आज तक यहां का सेब ब्रांड नहीं बन पाया है। आज भी यह सेब हिमाचल सेब के नाम से बाजार में बिक रहा है। इससे यहां के किसान काफी मायूस हैं। किसानों का कहना है कि हमारी मेहनत का फायदा दूसरे राज्य के लोग ले रहे हैंं, जिसका उन्हें काफी मलाल है। सरकारी विभाग देहरादून के ए सी कमरों में बैठकर बड़ी -बड़ी मीटिंग और सेमिनार करते हैंं, लेकिन राज्य निर्माण के 19 साल बाद एक दिन के लिए भी कोई विभागीय अधिकारी व कर्मचारी सेब के खेतों में झांंकने तक नहीं पहुुंचे
पहुंचे। इससे विभागीय अधिकारी व मंत्री किसानों की मूल समस्याओं से रूबरू नहीं हो पाते हैंं। नतीजतन किसानों को भारी नुकसान झेलना पड़ता है।
देशभर में तीन राज्य जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश व उत्तराखंड ही मुख्य सेब उत्पादक राज्य हैंं। इनमें सबसे कम सेब उत्तराखंड में होते हैंं।जम्मू -कश्मीर व हिमाचल का सेब देशभर के अलावा विदेशों में भी जाता है। उत्तराखंड में राज्य सरकारें सेब की खेती के लिए कागजी योजनाएं खूब बना रही हैंं, लेकिन विभागीय अधिकारियों की रुचि न होने के कारण यहां पर सेबों की गुणवत्ता और उत्पादकता में खास ईजाफा नहीं हो पा रहा है। जबकि यहां पर सेब उत्पादन के लिए कई पर्वतीय जिलों में उचित जलवायु मौजूद है। आज, बस जरूरत इस बात की है कि उद्यान विभाग के अधिकारी और मंत्री किसानों की जमीनी हकीकत से रूबरू होंं, किसानों को समय -समय पर उच्च गुणवत्ता के कीटनाशक, कृषियंत्र, उचित प्रशिक्षण और विपणन की व्यवस्था हो, तभी सेब उत्पादक किसान खुशहाल होंगे और राज्य आर्थिक तरक्की कर पायेगा।