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संस्कृति:  पाश्चात्य संस्कृति की कदमताल के चलते विलुप्त हुआ कौमुदी महोत्सव- डॉ राजे सिंह नेगी

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सत्येंद्र सिंह चौहान
ऋषिकेश, 30  अक्टूूूबर।अंतरराष्ट्रीय गढ़वाल महासभा के अध्यक्ष डॉ राजे सिंह नेगी ने देश में कौमुदी महोत्सव की लुप्त होती परंपरा पर चिंता जताई है। शरद पूर्णिमा पर पर आयोजित होने वाले कौमुदी महोत्सव को लेकर महासभा के अध्यक्ष डॉ नेगी ने कहा कि पाश्चात्य संस्कृति की ओर कदमताल में वैलेंटाइन डे को ही प्रेम दिवस मान लेने के चलते कौमुदी महोत्सव लुप्त होकर रह गया।जबकि सनातन धर्म में प्रेम की परिभाषा वर्तमान के प्रेम से बिल्कुल भिन्न है। कौमुदी पर यह पर्व संदेश देता है कि आई लव यू जैसे शब्द प्रेम को सिर्फ दूषित ही करते हैं। यदि प्रेम को समझना है तो पहले मैं और तुम यानि आई और यू को हटाना होगा। कौमुदी महोत्सव सदियों से प्रेम का पर्याय रहा है और इसमें साधारण मनुष्य के प्रेम कलाप प्रकट होते हैं।
अंतरराष्ट्रीय गढ़वाल महासभा के अध्यक्ष डॉ नेगी ने बताया कि प्राचीन भारतवर्ष में शरद पूर्णिमा के दिन यह महोत्सव मनाया जाता था। कौमुदी महोत्सव में युवक और युवतियां अपने प्रेम का उद्गार प्रकट करते थे। विवाहित जोड़े अलग होते थे। उनका मंच अलग होता था। प्रेम प्रस्ताव रखने के लिए बने मंच अलग होते थे। यह राष्ट्रीय महोत्सव होता था। कौमुदी महोत्सव की प्रतीक्षा युवा वर्ग वर्ष पर्यन्त करता था। लेकिन पाश्चात्य संस्कृति को अपनाने की होड़ में देश में एक ओर जहां वैलेंटाइन डे की परंपरा शुरू हो गई वहीं कौमुदी महोत्सव जैसे महोत्सव विलुप्त हो कर रह गए।