Home उत्तराखंड परंपरा: श्रद्धा की कलात्मक प्रस्तुति है कुमाऊं की ऐपण लोक कला

परंपरा: श्रद्धा की कलात्मक प्रस्तुति है कुमाऊं की ऐपण लोक कला

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खष्टी बिष्ट
नैनीताल, 02 नवंबर। कुमाऊं की लोक कला एवं शिल्प के अंतर्गत ऐपण, भित्ति चित्र, पट्टी के वसुंधरा, स्वास्तिक, पीठ भद्र, जनेऊ चौकी, लक्ष्मी चौकी, सरस्वती चौकी, विवाह चौकी, जनेऊ चौकी, नवदुर्गा चौकी, शिव पीठ, शक्तिपीठ, पूजा स्थल के ऐपण, लक्ष्मी पद चिन्ह एवं देहरी के ऐपण आदि शामिल हैं।
कुमाऊं की महिलाएं इस लोक कला को तन मन व श्रद्धा के साथ बनाती हैं। विशेषकर अपना धार्मिक प्रतीक मानकर कई पीढ़ियों से इन परंपरागत  प्रतीकों का बनना आवश्यक समझा जाता है। यहां की महिलाएं पूजा स्थल, घर, द्वार एवं प्रांगण में कुमाऊंनी अल्पना के सहज सुंदर आलेखन से परंपरागत लोक कला को जीवन प्रदान करती हैं और आने वाली पीढ़ियों को इस परंपरा को धरोहर रूप में सौंपती हैं।
गौरतलब है कि प्राचीन समय में इन आंकड़ों को गेरू एवं विशवार चावल का आटा आदि से बनाया जाता था।
लेकिन वर्तमान समय में इस विधा को पेंट के माध्यम से माताएं और बहनें बनाती आ रही हैं। बिंदुओं के बिना ऐपण अधूरे एवं अशुभ माने जाते हैं। बिंदु अर्थात 0 प्रकृति विज्ञान के अनुसार बिंदु विश्व का बीज है, जिसमें सृष्टि की उत्पत्ति होती है। शरीर अथवा प्राण विज्ञान के अनुसार बिंदु जीव को जन्म देने वाला वीर्य है। गणित विज्ञान और आध्यात्म में बिंदु की महत्ता है। साधना के चित्र शक्ति की आध्यात्मिक दूरी बिंदु ही होती है, जिसके बाहर की ओर नाना प्रकार की शक्तियां विकसित होती हैं और उसी में विलीन हो जाती हैं। यंत्र का मध्यम केंद्र बिंदु ही है। एक बिंदु पूर्णता का सूचक एवं सर्व व्यापक है इसलिए अपनों में बिंदुओं का विशिष्ट स्थान होता है। कुमाऊं में बिंदुओं के द्वारा अनेकों संरचनाएं पूजा स्थल तथा भित्ती पर की जाती हैं। ऐपणों का रेखांकन करते समय भी इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि रेखाओं के समूह और पारस्परिक कपड़ों की समाप्ति बिंदुओं से ही होती है।

ऐपणों में वसुधारा का अपना एक विशेष महत्व होता है जिसके बिना ऐपण अधूरे व अशुभ माने जाते हैं। घर, द्वार, पूजा स्थल, तुलसी आदि सभी स्थानों पर वसुंधरा का होना आवश्यक होता है।