तरकश़: ये ‘बाबा व्यापार के, वो ‘सत्ता के संत’

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                     तरकश़
    लगती थी जिस संत की, बात  कभी अनमोल।
    जड़  विवाद  की  बन  गये, आज  उसी
      के  ‘बोल’।
    आज़ उसी  के  बोल , फजीहत  खूब
      करा दी।
    अपनी पूरी  असलियत,  लोगों को
    दिखला दी।
    ‘चिकित्सकों’  का  कर रहे,  बार  बार  अपमान।
    उनको  भी  बख़्शा  नहीं, बची  न जिनकी जान।
    ना   संतों   सा   आचरण,   ना    वैसी   मर्यादा।
    बाबा जी पर  चढ़  गया, अहंकार  कुछ  ज्यादा।
    कभी  गुरू थे  योग  के, अब  खाल़िस  व्यापारी।
    सत्तादल   के  साथ  है , गहरी   जिसकी  यारी।
    कोरोना   ने   डाल   दी ,  संकट   में   जब  जान।
    डॉक्टर  बन  के  आ  गए, धरती   पर ‘भगवान’।
    जोखिम  लेकर  जान  का,  निभा  रहे   हैं  फर्ज़।
    भुला   सकेगा  देश  ये,  कभी   न  उनका  कर्ज़।
    दो   ‘बाबा’    चर्चित    यहां ,   दोनों   बड़े  दबंग।
    दाढ़ी   भी  है   एक   सी,  सिर्फ   अलग 
    हैं   रंग।
    वो   ‘बाबा जी’  मौन   हैं,  सुन  कर  भी ‘तकरार’।
    ‘बातों’  से   जो   देश   की,   चला   रहे   सरकार।
    कौन   ‘धनुर्धर’  अब   करे,  इस   विवाद का अंत। 
    ये   ‘बाबा  व्यापार’   के,   वो   ‘सत्ता   के    संत’।
                                                                                                                  -धनुर्धर