नज़रिया: अर्णब की गिरफ्तारी के बाद उदारवादी मीडिया का बड़ा हिस्सा दुविधा में है

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    Janchouk.com में अनिल सिन्हा
    अर्णब गोस्वामी की गिरफ्तारी के बाद उदारवादी पत्रकारों का बड़ा हिस्सा गजब की दुविधा में नजर आया। इसमें सिद्धार्थ वरदराजन और रवीश कुमार जैसे वे चेहरे भी शामिल हैं, जो सच्चे पत्रकार हैं और देश के लोकतंत्र को बेहतर बनाने के लिए लड़ रहे हैं। आम लोगों से उनके दिली रिश्ते हैं। उन लोगों को इसमें कोई संदेह भी नहीं है कि अर्णब की पत्रकारिता नफरत फैलाने वाली और लोकतंत्र के खिलाफ है। यह सत्ता की ओर से किए जाने वाले दमन तथा तानाशाही के पक्ष में खड़ी होने वाली पत्रकारिता है। इसके बावजूद उन्होंने गिरफ्तारी को लेकर महाराष्ट्र सरकार की आलोचना की है। अर्णब को लेकर मीडिया हस्तियों या पत्रकार संगठनों के बयान में बचाव की मुद्रा है। कई तो आत्मालाप में हैं, जिनमें लोग मीडिया से ज्यादा अपने बारे में बात कर रहे हैं। जाहिर है कि वे सिर्फ फर्ज अदायगी करते नजर आ रहे हैं। उनमें अपनी पवित्रता बचाने का भाव है।
    शायद उन्हें लगता है कि इस फर्ज अदायगी से वे अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार को बचा लेंगे। इसके विपरीत, आरफा खानम शेरवानी समेत कई पत्रकार हैं जो अपनी वाजिब बेचैनी को सामने रख रहे हैं कि क्या उदारवादी पत्रकारों की यह रणनीति कारगर होगी? आरफा ने पूछा है कि क्या वाकई अर्णब को उदारवादी पत्रकारों की मदद की जरूरत है, जब उसके पीछे मोदी मंत्रिमंडल के आधा दर्जन से ज्यादा मंत्री तथा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत भाजपा का पूरा संगठन खड़ा है। पार्टी के झंडे तले गिरफ्तारी का विरोध करने में कोई हर्ज नहीं है, लेकिन केंद्र के मंत्रियों और दूसरे राज्य के मुख्यमंत्रियों का किसी राज्य की पुलिस कार्रवाई की इस तरह निंदा करना तथा उस पर अनर्गल टिप्पणी करना भारतीय संविधान के खिलाफ है। यह फेडरलिज्म के विरूद्ध है।
    सवाल उठता है कि उदारवादी पत्रकारों तथा संगठनों ने इस तरह का रवैया क्यों अपनाया? गौर से देखने पर यही लगता है कि यह पत्रकारिता की दुनिया में पनपे व्यक्तिवाद की वजह से है। पत्रकारों को किसी साझे तथा संगठित प्रयास में यकीन नहीं रह गया है। इस व्यक्तिवाद की वजह से ही वे अर्णब को एक व्यक्ति के रूप में देखते हैं और उसे एक भटके व्यक्ति के रूप में चित्रित करते हैं। बहुत कम लोग हैं जो मीडिया संस्थानों, भ्रष्ट कारपोरेट तथा भाजपा के बीच की पार्टनरशिप को खुलकर निशाना बनाना चाहते हैं।
    पिछले छह सालों में इस पार्टनरशिप ने सूचना का एक ऐसा तंत्र खड़ा किया है, जो झूठ और नफरत फैलाने में माहिर है। यह तंत्र सिर्फ सांप्रदायिकता के पक्ष में नहीं खड़ा है, बल्कि उस लूट में भी भगीदार है, जिसमें कोरोना जैसी महामारी के बीच भी सरकारी कंपनियां बेची जा रही हैं और किसानों को व्यापारियों के सामने लाचार खड़ा रखने की कोशश की जा रही है। उदारवादी पत्रकारों की व्यक्तिगत पवित्रता से यह तंत्र कमजोर नहीं होने वाला है।
    इससे अर्णब या गोदी मीडिया के दूसरे पत्रकारों के कामकाज पर भी कोई असर नहीं होने वाला है, क्योंकि यह उनके व्यक्तिगत चुनाव का मामला नहीं है। अर्णब कोई व्यक्ति या प्रवृत्ति नहीं हैं। वह इस तंत्र का हिस्सेदार है। लठैत से हिस्सेदार बनने के बाद उसमें जो अकड़ आती है, वह इसका खुला प्रदर्शन करता है। क्या यह बताने की जरूरत भी है कि उसका चैनल किस पार्टी के राजनीतिज्ञ के पैसे से चलता है?
    एक और बात ध्यान में रखने की है कि कांग्रेस शासन की निरंकुशता और मोदी-शासन को एक ही तराजू पर तौलना जायज नहीं है। लोकतांत्रिक मर्यादा की हर सीमा का उल्लंघन करने वाले तथा विरोध की हर आवाज को दबा देने वाले मौजूदा शासन की तुलना पहले के किसी भी दौर से करना ज्यादती है। यह सरासर गलत होगा कि झूठ फैलाने का संगठित तंत्र चलाने वालों की तुलना असंगठित झूठ बोलने वालों से की जाए। एक कुतर्क जिसे समझदार लोगों ने भी स्वीकार कर रखा है कि उद्धव सरकार ने यह गिरफ्तारी अर्णब की तीखी आलोचना के प्रतिक्रिया में किया है।
    अगर गौर से देखें तो यह एक बचकाना तर्क है। अर्णब ने कौन सा घोटाला उजागर किया है, जिससे उद्धव सरकार में बैठे लोगों के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है? क्या उसके चीखने-चिल्लाने से शिव सेना का जनाधार घट जाएगा? कुछ लोग पालघर लिचिंग के समय सोनिया गांधी के खिलाफ निचले स्तर की टिप्पणियों से कांग्रेस की नाराजगी का हवाला दे रहे हैं और इसकी भूमिका भी बता रहे हैं। वे यह भूल जा रहे हैं कि सुसाइड में उसकी संदिग्ध भूमिका को लेकर रायगढ़ में दर्ज हुए मुकदमे के दो दिन बाद यानी 9 मई को कांग्रेस ने अर्णब की गिरफ्तारी की मांग की थी। पालघर हत्याकांड अप्रैल, 2020 में हुआ था।
    जहां तक उसकी गिरफ्तारी के पीछे राजनीति का सवाल है तो यह निश्चित तौर पर है। अर्णब का चैनल मोदी सरकार तथा भाजपा के लिए एक प्रोपगंडा चैनल का काम कर रहा है और वह खुद एक जहर भरी भाषा बोलने वाले पार्टी प्रवक्ता की भूमिका निभा रहा है। समाज में वैमनस्य तथा झूठ फैलाने के लिए उसकी गिरफ्तारी काफी पहले हो जानी चाहिए थी, लेकिन वह इसलिए बचा रहा कि देश में संविधान का राज खत्म हो गया है। आत्महत्या के लिए उकसाने के जिस मामले में वह गिरफ्तार हुआ है, उसमें वह अब तक इसलिए बचा रहा कि उसे फड़नवीस सरकार का संरक्षण मिला हुआ था।
    केंद्रीय गृह मंत्री के बयान के बाद तो यह साफ हो गया है कि अर्णब टीवी के पर्दे पर जो बदतमीजी तथा पत्रकारिता के नाम पर जो गुंडई कर रहा है, उसे मोदी सरकार का संरक्षण मिला हुआ था। राज्य में राजनीतिक परिवर्तन के कारण ही उसे गिरफ्तार करना संभव हुआ है। इसलिए गिरफ्तारी को राजनीति से अलग बताना एक बड़ा पाखंड होगा। उद्धव ठाकरे की सरकार ने संविधान के पक्ष में राजनीति की है। हम  सामान्य आदमी को न्याय दिलाने का महत्व नहीं समझ रहे हैं।
    अर्णब उस बीमारी का एक लक्षण है, जिससे भारत का मीडिया ग्रस्त है। मीडिया की सफाई के लिए सबसे पहली जरूरत है कि मीडिया संस्थानों की कमाई को सार्वजनिक किया जाए। एक साथ कई माध्यमों पर कब्जा करने वाले संस्थानों को एकाधिकार से वंचित किया जाए। पत्रकारों को नौकरी की पूरी सुरक्षा मिले। समाज को विभाजित करने वाली खबरें चलाने वालों को अदालत में घसीटने के लिए मुहिम चले। क्या लोकतांत्रिक राजनीति के समर्थन में आए बगैर यह संभव है? राजनीति का मतलब पार्टियों की गुलामी नहीं है। पत्रकारों को निर्गुण गाना बंद करना होगा।
    (अनिल सिन्हा वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं। यहां व्यक्त विचार उनके अपने विचार हैं)