Home उत्तराखंड परंपरा: टिहरी राजपरिवार में दशहरा पर्व पर की गई शस्त्र पूजा

परंपरा: टिहरी राजपरिवार में दशहरा पर्व पर की गई शस्त्र पूजा

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संवाददाता
देहरादून- टिहरी राज्य भले ही अब अस्तित्व में नहीं है, लेकिन युद्ध एवं शौर्य  से जुड़ी अपनी गौरवशाली क्षत्रिय परंपराओं, विशेष रूप से शस्त्र पूजा  का पालन आज भी टिहरी राजपरिवार में निरंतर रूप से होता है। यहां राजपुर रोड पर स्थित  समर हाउस में रहने वाले टिहरी राजवंश के लोगों द्वारा आज दशहरे के मौके पर
शस्त्रों की पूजा की गई। इस पूजा का आयोजन पुराना दरबार के ट्रस्टी श्री भवानी प्रताप सिंह पंवार ने कराया। इस आयोजन में करीब 4 दर्जन चुुनिंंदा लोग शामिल हुए। इस दौरान कोरोना की वजह से जरूरी दूरी का पालन किया गया। राजगुरु आचार्य कृष्णानंद नौटियाल ने पूजा कराई। राजपरिवार के ठाकुर भवानी प्रताप सिंह पवार ने कहा कि चांदपुर गढ़ी की  दशहरे की जो परंपराए हैं उन्हें निरंतर आगे बढ़ाया जाएगा। हम अपनी प्राचीन मान्यताओं को मानकर ही समाज के सामने अपनी संस्कृति को प्रगाढ़ करेंगे। महाराज प्रदुम्न शाह समिति के अध्यक्ष शीशपाल गुसाईं ने कहा कि शस्त्रों की पूजन करना प्राचीन मान्यताओं को आज के समय लागू करना है। इस शस्त्र पूजन से महाराजा कनक पाल सिंह याद आते हैं, जिन्होंने अपनी यात्रा चांदपुरी गढ़ से शुरू की थी।
गढ़वाल का गौरवशाली इतिहास रहा है। शस्त्रों के  पूजन का जिक्र पुराणों, उपनिषदों, रामायण में मिलता है। इसी का अनुसरण प्रथम राजा गढ़वाल कनक पाल सिंह ने 1337 साल पहले किया था। कर्नल आलोक सिंह रावत ने थोकदारी प्रथा के अनुसार, बलि  के तौर पर भुजेला ( पेठा )  काटकर  समर्पित किया।बद्रीनाथ से आए हरीश डिमरी ने कहा कि जो प्रसाद नरेन्द्रनगर जाता था, वह अब देहरादून भी आएगा और दशहरे में पूजन करना सबको सिद्धि देगा। 

पारम्परिक त्योहार दशहरा को पूर्ण विधि विधान से मनाया गया। इस पावन अवसर पर शस्त्र पूजन की प्राचीन व महत्वपूर्ण परंपरा को भी पारंपरिक रीति रिवाजों के रूप में सम्पन किया गया। इस परंपरा के बारे में टिहरी दरबार के वंशज ठाकुर भवानी प्रताप सिंह पवार, जो कि वर्तमान में टिहरी दरबार के मुख्य संरक्षक हैं, ने विस्तार से बताते हुए कहा कि इस परंपरा की शुरुआत गढ़वाल रियासत में पवांर वंश के द्वारा आरंभ की गई, जिसमे महाराज कनकपाल ने दशहरे के दिन शस्त्र पूजन का विधान चांदपुर गढ़ी से आरम्भ किया। तत्पश्चात ये परंपरा देवलगढ़ से होते हुए श्रीनगर व टिहरी तक बड़े ही धूम धाम से मनाई जाने लगी। रियासत काल में इस दिन राजकोष की भी घोषणा की जाती थी। इस अवसर पर विभिन्न क्षेत्रों से जागीरदारों, थोकदारों द्वारा दरबार में कुल देवी राजराजेश्वरी की पूजा के साथ भेंट चढ़ाने की प्रक्रिया संम्पन होती है। इसी के साथ समस्त कुल देवताओं व वीरपुरुषों आदि का भी पूजन व स्मरण किया जाता हैं। 

दशहरा त्योहार पूजन में शस्त्र पूजन राजगुरु आचार्य कृष्णानंद नौटियाल द्वारा केदारनाथ धाम के प्रसाद के रूप में ब्रह्मकमल,  जिसे शैलेश नौटियाल द्वारा लाया गया, एवं भगवान श्री बद्री विशाल के प्रसाद रूप में तुलसी माला,  जो कि हरीश डिमरी द्वारा लाया गया ,के साथ पारंपरिक तरीके से किया गया। इस पावन अवसर पर राजपरिवार के सदस्यों में ठाकुर भवानी प्रताप सिंह, ठाकुर कीर्ति प्रताप सिंह, डॉ योगंबर सिंह बर्त्वाल, मोहन सिंह नेगी, हरीश डिमरी, डॉ अर्चना डिमरी, कुसुम रावत, बद्री प्रसाद उनियाल, स्वामी सिंधु सागर जी महाराज, राजेन्द्र काला, राजेश पंवार आदि उपस्थित रहे।
इसी के साथ अन्य गणमान्य व्यक्तियों द्वारा भी राजराजेश्वरी की पूजा अर्चना की गई। साथ ही सभी ने वर्तमान परिस्तिथियों के जल्द ही सही होने की मंगल कामनाएं की। सनातनी परंपरा व दस्तूर के दशहरा पर्व को लेकर सभी ने शुभकामनाएं दीं।