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ग्लोबल वार्मिंगः सर्दी के मौसम में भी धधक रहे हैं उत्तराखंड के जंगल

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संवाददाता
देहरादून, 6 नवंबर।
उत्तराखण्ड के जंगलों में आग लगने की घटनाएं जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के कारण घट रही हैं। पहाड़ों में पड़ रही ठंड के बावजूद राज्य के जंगल अक्तूबर माह से आग से धधक रहे हैं।
वन विभाग के मुताबिक पिछले सवा महीने में उत्तराखण्ड के लगभग 75 प्रतिशत जंगल दावाग्नि की भेंट चढ़ गये हैं। इसके चलते पहली बार अक्तूबर से फॉरेस्ट फायर की मॉनिटरिंग शुरू की गई है। अल्मोड़ा, त्यूनी, उत्तरकाशी, चमोली और पौड़ी में इस तरह की घटनाएं सामने आई हैं। इन घटनाओं में करीब दो लाख से ज्यादा की वन संपदा को नुकसान पहुंचा है। जबकि इसी साल फायर सीजन यानी 15 फरवरी से 15 जून तक 135 घटनाओं में 172 हेक्टेयर जंगल ही जले थे।

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बारिश न होना मुख्य कारण
उत्तराखंड के ज्यादातर इलाकों में सितंबर से बारिश नहीं हुई है और पहाड़ों पर अच्छी धूप खिल रही है इस कारण मौसम काफी सूखा हो गया है। इस कारण जंगलों में नमी नहीं है। इसके अलावा लॉकडाउन के बाद लोगों की सक्रियता अचानक बढ़ने लगी है। घास पाने के लिए भी जंगलों में सूखी पत्तियां जलाई जा रही हैं।

फायर सीजन के बाद भी धधक रहे जंगल
उत्तराखंड में जंगल इस बार फायर सीजन के बाद भी धधक रहे हैं। एक अक्तूबर से अब तक गढ़वाल के जंगलों में 58 घटनाएं तो कुमाऊं के वनों में 11 घटनाएं हुई हैं। इन हालात में वन विभाग ने जंगलों की आग बुझाने के लिए फायर सीजन की तर्ज पर अग्नि शमन के उपाय लागू कर दिए हैं। वन अफसरों के मुताबिक ठंड का सीजन शुरू होने के चलते लकड़ी—घास के लिए इंसान का जंगल में मूवमेंट बढ़ा है।

केंद्र का फायर अलार्म
केंद्र सरकार की ओर से राज्यों को सेटेलाइट के जरिए 15 फरवरी से 15 जून तक फायर अलार्म दिया जाता है। राज्य में जहां—जहां आग की घटनाएं हुई हैं, उसकी जानकारी राज्य के वन विभाग समेत दूसरे विभागों के अफसरों को भेजी जाती हैं। ताकि आग लगने की स्थिति में तुरंत काबू पाया जा सके। मगर इस बार राज्य सरकार ने केन्द्र से गुजारिश कर एक अक्तूबर से ही फायर अलार्म शुरू करा दिया है।