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चिंतन: पहाड़ी युवा प्रवासियों के प्रति नजरिया बदले समाज, घर वापसी पर उलाहना देना गलत

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रजपाल बिष्ट
गोपेश्वर-  कोरोना वायरस के संक्रमण के चलते देश विदेश में नौकरी कर रहे पहाड़ी युवाओं के घर लौटने पर सोशल मीडिया पर चल रही नकारात्मक टिप्पणियों को लेकर सामाजिक चिंतक हैरान परेशान होकर रह गये हैं। सामाजिक चिंतकों का मानना है कि रोजगार के लिए देश विदेश गए लोगों के प्रति ऐसी टिप्पणियों को लेकर समाज को प्रवासियों के प्रति अपना नजरिया बदलना चाहिए।
दरअसल कोरोना वायरस के दुनिया भर में तेजी से फैलने के चलते देश विदेश में रोजगार कर रहे लोग अपने घरों को वापस लौट रहे हैं। तमाम देशों तथा प्रदेशों में लॉकडाउन के चलते कल-कारखाने, मल्टीनेशनल तथा तमाम कंपनियों से लेकर होटल व शैक्षणिक संस्थान बंद हो चले हैं। इसके चलते रोजगार तथा शिक्षा ग्रहण कर रहे तमाम युवा घरों को लौट आए हैं तो कुछ अभी भी लौटने की तैयारी कर रहे हैं। राज्य में रोजगार के संसाधन न होने के चलते ही यहां के युवा देश विदेश में रोजगार करने को विवश हैं। मौजूदा दौर में विदेशों के अलावा दिल्ली, कोलकाता, बैंगलोर, मुंबई, चेन्नई, सूरत, बडोदरा, कानपुर, पुणे, नोएडा, गुड़गांव समेत तमाम महानगरों में रोजगार हासिल कर रहे हैं। देश विदेश में पहाड़ के होनहारों की बड़ी खेप होने के चलते ही पहाड़ी गांव वीरान भी पड़े हैं। हालांकि कतिपय लोगों ने अपने घर-बार महानगरों में ही बसा दिये हैं तो कम पैसे वाले लोग नौकरी कर अपने परिजनों का भरण पोषण कर रहे हैं।
प्रवासी युवा इस बीच घर लौट रहे हैं तो सोशल मीडिया पर उन्हें कोरोना महामारी के डर से पहाड़ों पर चढ़ने का व्यंग्य कसा जा रहा है। देश विदेश में रोजगार के अवसर बंद हो जाने के चलते उनका घर लौटना स्वाभाविक भी है। अब कुछ लोग अपने पुस्तैनी घरों को लौटने पर उन्हें निशाना बना रहे हैं। सोशल मीडिया पर इस तरह की पोस्ट वाइरल होने के चलते सामाजिक चिंतक हैरान परेशान हो चले हैं। अब सवाल उठ रहा है कि रोजगार, शिक्षा तथा अन्य मजबूरियों के कारण पलायन कर गये लोगों को घर वापस नहीं लौटना चाहिए ? सोशल मीडिया पर कुछ ऐसे व्यंग्य भी कसे जा रहे हैं कि जब गांव के भले बुरे कामों में वे लोग वर्षों से गांव नहीं आए तो अब जान बचाने उत्तराखंड के पहाड़ों को क्यों चढ़ रहे हैं ? सामाजिक चिंतक व बीकेटीसी के मीडिया प्रभारी रहे डा हरीश गौड़ व हिमाद के सचिव उमाशंकर बिष्ट का कहना है कि पहाड़ के देश विदेश में रोजगार कर रहे लोगों को क्यों नहीं अपने घर आना चाहिए ? अपनी मिट्टी से जुड़े रहने के लिए उन्हें घर आना ही चाहिए। उनका कहना है कि बिल्कुल ऐसे रोजगार कर रहे लोगों को अपने घर जरूर आना चाहिए। हां, उत्तराखंड पहुंचने से पहले अपने स्वास्थ्य की जांच करानी चाहिए और तब ही गांवों में प्रवेश करना चाहिए। वैसे भी ईरान कुवैत युद्व हों या अन्य कोई त्रासदी हो तब संकट में फंसे लोगों को भारत सरकार अपने नागरिकों को स्वदेश लाई है। स्वाइन फ्लू, ईबोला, सार्स, मर्स, बर्ड फ्लू आदि सभी बीमारियां विदेशों की ही देन रही हैं।
  अब वैश्विक स्तर पर कोरोना वायरस संक्रमण ने पांव फैलाएं हैं तो रोजगार के छिन जाने से यहां के युवाओं का सकुशल अपने घरों को लौटना लाजमी है। कई नौनिहाल तो उच्च शिक्षण संस्थानों में अध्ययन के लिए गये हैं। उनका भी शैक्षणिक संस्थानों के बंद होने से घर लौटना जरूरी ही है। वैसे भी घर बैठे बैठे रोजगार के अवसर नहीं मिल पाते। उत्तराखंड में हालात अब भी रोजगार के अवसर पैदा करने के हैं ही नहीं। देश विदेश में उद्योग धंधे लॉकडाउन हो जाने के कारण रोजगार के अवसर समाप्त हो गये हैं। इसलिए युवाओं का अपने गांवों को आना जारी है। पलायन रोकने के लिए ही वैसे उत्तराखंड राज्य की मांग खड़ी हुई थी किंतु राज्य अभी रोजगार के अवसर पैदा करने के लिए अनुकूल स्थिति नहीं बना पाया है। मजबूरी में ही लोग गांव घरों को छोड़ महानगरों को जा रहे हैं। कई जगह तो प्रवासियों के पहाड़ों पर आने पर कंडाली की धमकी दी जा रही है। इस तरह की सोच को उचित नहीं कहा जा सकता। अब जबकि कोरोना वायरस के चलते समूची दुनिया के हाथ पांव फूले हैं तो तब यहां के युवाओं के घर लौटने को लेकर हायतौबा खड़ा करना किसी के भी गले नहीं उतर पा रहा है।
इसलिए अब समाज को युवाओं के प्रति नजरिया बदलना होगा। यदि नजरिये में बदलाव नहीं किया गया तो युवाओं के प्रति इस तरह की नकारात्मक सोच भविष्य के लिए नुकसानदेह साबित होगी। इसलिए समाज को रोजगार के लिए बाहर रहकर वापस लौट रहे लोगों को हाथों हाथ लेना चाहिए और उनके प्रति इस तरह की नकारात्मक टिप्पणी से बचना चाहिए।