चिंताजनक:  पानी की एक एक बूंंद के लिए तरसते निरीह परिंदे…

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    (अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस पर विशेष)
    मनमीत
    देहरादून- कल (आज) जैव विविधता दिवस, यानी Biodiversity Day है। इस बार का जैव विविधता दिवस इसलिए भी खास है, क्योंकि इस बार दुनिया भर की जैव को कोरोना संकट के चलते ऑक्सीजन मिली है। लेकिन, इसी जैव विविधता में सबसे महत्वपूर्ण स्थान रखने वाले पक्षी फिर भी संकट में हैंं। देहरादून में संरक्षित प्रजाति के बाज और कौवे जमीन पर बेहोश होकर गिर रहे हैं। गत साल भी सैकड़ों बाज और कौवे देहरादून के बंजारावाला, सहस्रधारा रोड और डालनवाला आदि इलाकों में गिरकर मर गए थे। इस साल भी पारा जैसे ही 35 से पर हुआ, पक्षी डिहाइड्रेशन का शिकार हो रहे हैं।
    गुरुवार की दोपहर को मैं किसी काम से सहस्त्रधारा रोड की तरफ जा रहा था कि उषा कॉलोनी के बाहर सड़क के बीच में एक के बाद एक कई कौवे बेहोश मिले। उनमें से कुछ को उठाकर मैंने और मेरे साथी गौरव असवाल ने पानी पिला दिया और उनकी जिंदगी बच भी गई। लेकिन ऐसे सैकड़ों पक्षी दून में प्यासे हैं, जिनको इंसानी मदद की जरूरत है। इंसानी मदद की इसलिए भी क्योंकि उनको इस हाल तक पहुंचाने का कारण भी इंसान ही है।मैंने कुछ विशेषज्ञों से बात की है। उन्होंने इसका कारण डिहाइड्रेशन बताया। मतलब, बाजों और कौवों को पर्याप्त पानी पीने को नहीं मिल रहा है। इस कारण कई बाज़ देहरादून से कहीं और शिफ्ट भी हो गये हैं। जो शिफ्ट नहीं हुये, वो प्यास से मर रहे हैं। विशेषज्ञ ये भी बताते हैं कि पहले दून के बीचों बीच बहुत जलधारायें थी। जैसे ईसी रोड, कैनाल रोड, डब्ल्यूसी रोड आदि आदि। ये सभी नहर थी, जो अब अंडरग्राउंड हो गई है। यानी पूरा शहर कंक्रीट का हो गया है। पालतू जानवर तो फिर भी इंसान से पानी मांग लेता है, लेकिन पक्षी थोड़ा डरते हैं, इसलिये वो अमूमन इंसान के पास नहीं आते। हम इंसान केवल अपने बारे में सोचते हैं। किस हद तक सोचते हैं, इसके कई उदाहरण हैंं दुनिया में। मुझे अभी मध्य एशिया का अराल सागर याद आ रहा है। ये एक झील है। जो दुनिया में चौथी नंबर की बड़ी झील है। इसका क्षेत्र फल कभी 68,000 वर्ग किमी था। यानी उत्तराखंड के क्षेत्र से भी बड़ी।

    ये पहले यूएसएसआर यानी सोवियत रूस में थी। इसके चारों तरफ खुशहाल जीवन था। मछली, पक्षी, जानवर और इंसान सभी खुश थे। फिर एक दिन इंसान को लगा कि उसके लिये खाना कम न पड़ जाये। इसलिये सोवियत सरकार ने जिस मुर्गी से सोने का अंडा मिल रहा था। लालच में उसका पेट फाड़ कर हत्या कर दी। जिस जलधारा से इस झील को खुशहाल जीवन मिलता था, उसे मोड़ दिया गया। उसका पानी दूर ले जाकर कपास और चावल की खेती की जाने लगी। धीरे धीरे ये झील सूखने लगी और आखिरकार 2010 में इसने दम तोड़ दिया। इसके साथ ही हजारों पक्षी, मछली और जानवर भी मर गये। हजारों की तादाद में पक्षियों और इंसानों ने वहां से पलायन कर दिया। अब वहां पर रूस का कब्जा नहीं है। अब ये झील क्षेत्र कजाकस्तान, उजबेकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान की सीमा पर पड़ता है। एक सूखी झील के चारों ओर वीरान गांव। इस झील से लूटे गये पानी ने उजबेकिस्तन को दुनिया में सबसे बड़े कपास का उत्पादक तो बना दिया, लेकिन लाखों पक्षी और जानवरों की कीमत पर। पहले साइबेरियाई पक्षी यहां भी जाते थे। अब ये पक्षी पाकिस्तान और भारत के उत्तरी राज्यों की तरफ  रुख कर चुके हैं। दून में ये आसन बैराज पर सर्दियों में आते हैं। हालांकि अब उजबेकस्तान सरकार उसी जलधारा पर बांध बनाकर अराल झील को रिचार्ज कर रही है। देखते हैं कब तक हो पाती है।

    हम इस पृथ्वी पर अकेले पड़ने लगे हैंं। कई प्रजाति हमने मार डालींं। हजारों झीलें हम सुखा चुके। हिमालय भी ग्लोबल वार्मिंग से तप रहा है। बड़े बांधों ने जैव विविधता की सुनियोजित हत्याएं की हैंं। परमाणु संयंत्रों ने पेड़ पौधों को जहरीला कर दिया है। सरकार हर साल लक्ष्य तय करती है कि चारों धामों में लाखों की तादाद में यात्री पहुंचेंं। कितना नुकसान होता है। ऐसा ही कभी नंदा देवी राजजात यात्रा में पूर्व मुख्यमंत्री ने हजारों लोगों को यात्रा का एक अहम पड़ाव बेदनी बुग्याल चढ़ा दिया। एक साथ दस हजार लोगों ने बेदनी बुग्याल में सुबह मल मूत्र किया, हरी घास चौपट कर दी और ब्रह्म कमल को नष्ट कर दिया। रूपकुंड से सैकड़ों साल पुरानी लाशों की हड्डी चुरा ली। ये सब देखकर रोना आ गया। खैर…पृथ्वी को जितना बदसूरत हमने पिछले 200 सालों में किया है, उतना तो हजारों सालों में नहीं हुआ था। हम 18 वीं सदी के बाद की सभ्यता को मॉडर्न सभ्यता कहते हैं। लेकिन भविष्य में हम अपनी आने वाली पीढ़ी से बहुत गाली खायेंगे।

    (मनमीत की फेसबुक वाल से साभार)