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वेदना:  मुंबई से पत्रकार ने भेजा सीएम को खत, प्रवासी उत्तराखंडियों के दर्द से कराया रूबरू 

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देहरादून- लॉकडाउन की वजह से रोजगार छिन जाने से मुंबई मेंं रह रहे प्रवासी उत्तराखंडी भी अब वापसी के लिए आतुर हैं। मुंबई के वरिष्ठ पत्रकार केशर सिंह बिष्ट ने मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को पत्र लिख कर वहां के प्रवासियों की दुश्वारियों से अवगत कराते हुए उनकी वापसी के लिए कारगर व्यवस्था सुनिश्चित कराने का अनुरोध किया है। पत्र मूल रूप में यहां प्रस्तुत है-
मुंबई की अवहेलना के खिलाफ प्रेषित पत्र !
दिनांक : 18 मई, 2020
सेवामें
श्री त्रिवेंद्रसिंह रावत जी,
मुख्यमंत्री,
उत्तराखंड सरकार
 विषय- अब दर्द हद्द से गुज़र गया है, क्या करें हम ?

आदरणीय मुख्यमंत्री जी,
सादर प्रणाम !

आज तक जीवन में जिन्हें भी पत्र लिखा, शुरुआत इसी वाक्य से की- ‘आपको बताते हुए हर्ष हो रहा है’। पहली बार लिख रहा हूँ कि ‘आपको बताते हुए दुःख हो रहा है’ कि मुंबई में बसा पहाड़ अब भावनात्मक रूप से बिखरने और ध्वस्त होने लगा है।

महोदय,

दर्द की इंतेहा हो गई है और हम सरेबाज़ार लुट गए हैं।

भावनात्मक रूप से उत्तराखंड सरकार की बेरुखी, आर्थिक रूप से होटल मालिकों, निजी संस्थानों की अवहेलना और घर वापसी पर ट्रेवल एजेंसियों के मनमाने किराए ने कहीं का नहीं छोड़ा।

अब जिनके पास शाम को भोजन का दाना तक नहीं, उनकी एक अदद ट्रेन की दम तोड़ती उम्मीद और घर वापसी की बुझती लौ से छा रहे घने अंधियारे में अब कहने को कुछ बचा नहीं।

फिर भी जो बचा है, वह कह देते हैं-

महोदय,
सूरत से 2, अहमदाबाद से 2, पुणे से 1, गोवा से 1, हैदराबाद से 1 ट्रेन चलाने के बावजूद मुंबई से अब तक एक भी ट्रेन न चलाने की वजह क्या है?

महोदय,
ग़र मुंबई को सबसे संक्रमित शहर मान कर यहां से प्रवासियों को उत्तराखंंड न आने देना परोक्ष कारण था, तो फिर अब तक बसों व निजी छोटे वाहनों से प्रदेश में मुंबई के हज़ारों प्रवासियों को आने की इजाज़त कैसे दी गयी?

महोदय,

उम्मीद है यह ट्रेन के यात्रा खर्च का मसला भी नहीं रहा होगा। क्योंकि किसी और राज्य के वासियों की तरह प्रवासी उत्तराखंडियों ने कभी इस बात पर शोर नहीं मचाया कि उत्तराखंड सरकार हमें मुफ्त में यात्रा कराए। प्रवासी कल भी अपने खर्च से यात्रा करने को तैयार थे और आज भी हैं।

महोदय,
क्या हम यह मान कर चलें कि अब ट्रेन की उम्मीद में उत्तराखंड सरकार की ओर देखना मृगतृष्णा के सिवाय कुछ नहीं?

महोदय,
क्या हमें उम्मीद छोड़ देनी चाहिए कि विशेष ट्रेन का अधिकार हैदराबाद, पुणे, सूरत, अहमदाबाद व किसी भी दूसरे शहर को है, पर मुंबई को नहीं? यह सवाल तब और भी गंभीर हो जाता है जब कोरोना के संपूर्ण काल में मुंबई से दूसरे राज्यों के लिए विशेष ट्रेन का परिचालन खूब हुआ।

महोदय,
क्या मुंबई के उन भूख से रोते-बिलखते-तड़पते प्रवासी परिवारों के प्रति उत्तराखंड सरकार की कोई जवाबदेही नहीं है, जिनके पास बस के सफ़र के लिए 7-8 हज़ार तो छोड़िए, घर में सुबह-शाम के राशन तक की घोर तंगी है।

महोदय,
क्या एक अदद ट्रेन चलाने के लिए हमें राजनीतिक रसूखवाले लोगों के आगे नतमस्तक होकर मदद की याचना करनी होगी?

महोदय,
क्या हम मान कर चलें कि पलायन को लेकर चिंता मात्र एक मुद्दा भर था?

महोदय,

 यह सारे सवाल सिर्फ इसलिए कि प्रवासियों के इतिहास में मुंबई की भूमिका सबसे मुखर रही है और लगभग एक सदी की यात्रा में मुंबई के प्रवासियों ने उत्तराखंड की ग्रामीण व्यवस्था को नए आयाम दिए हैं। भरण-पोषण से लेकर उत्तराखंड की सामाजिक व आर्थिक उन्नत्ति को नया आयाम दिया और उत्तराखंड आंदोलन के दौरान भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

महोदय,

उत्तराखंड के प्रति इतनी गहरी आत्मीयता के बाद आज संकट की इस कठिन घड़ी में उन्हें यह एहसास कराना कि वे उत्तराखंड की व्यवस्था में कोई मायने नहीं रखते, कितना उचित है…? इस विषय पर आपकी राय जानने की उत्सुकता रहेगी।

अंत में….
क्या अब भी मुंबई से उत्तराखंड के लिए विशेष ट्रेन चलने की उम्मीद रख सकते हैं, जरूर अवगत कराइयेगा !

धन्यवाद !

भवदीय-
केशरसिंह बिष्ट
पत्रकार, मुंबई