खरी-खरी: पिछले 4 वर्षों से सीएम रावत के व्यक्तिगत विरोध की मुहिम में लगे हैं कुछ दुराग्रही

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    यू एस कुकरेती

    देहरादून, 15 फरवरी। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत का एक फोटो सोशल मीडिया में वायरल हो रहा है, जिसमें वह चमोली में आई आपदा से प्रभावित क्षेत्र में आम लोगों के साथ बैठे हुए हैं और उन्हें एक टेबिल में चाय के साथ ड्राई फ्रुट्स आदि परोसे गए हैं। इन टिप्पणियों के साथ कि आपदा के वक्त मुख्यमंत्री ड्राई फ्रुट्स का मजा ले रहे हैं, मुख्यमंत्री ने आपदा को अवसर बना लिया है, मुख्यमंत्री को मलवे में दबे लोगों की कोई फिक्र नहीं है, मुख्यमंत्री संवेदनहीन व्यक्ति हैं, उन्हें ट्रोल किया जा रहा है।

    दरअसल, लोकतंत्र में समालोचकों और पत्रकारों की अहम भूमिका होती है। उनका काम व्यवस्था की खामियां उजागर कर सरकार को आईना दिखाना होता है। स्वस्थ प्रजातंत्र के लिए यह बेहद जरूरी भी है। होना तो यह चाहिए कि सिस्टम (तंत्र) की कमियों की कलई खोलकर सरकार को सुधार के लिए विवश किया जाता पर हो कुछ और रहा है। हो यह रहा है कि मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत का व्यक्तिगत विरोध हो रहा है। निगाहें इस बात पर हैं कि त्रिवेन्द्र क्या खा रहे हैं, कहां ठहरे हैं और किससे बात कर रहे हैं किससे नहीं। अरे भाई! त्रिवेन्द्र सिंह रावत मुख्यमंत्री हैं और संविधान के तहत मुख्यमंत्री का प्रोटोकॉल होता है। आपदास्थल के निरीक्षण के बाद क्षेत्र में जब भी वो कहीं पर बैठते हैं, विश्राम करते हैं तो स्थानीय प्रशासन, जनप्रतिनिधि, आम लोग भी चाहते हैं कि उन्हें सम्मान के साथ अपने बीच बैठाया जाए।

    इस दौरान लोग दिल से उन्हें चाय-नाश्ता, भोजन परोसते हैं। किसी भी जनप्रतिनिधि (मुख्यमंत्री, मंत्री, विधायक, सांसद आदि) के लिए यह एक स्वाभाविक सम्मान होता है। अब उस दृश्य का फोटो वायरल कर मुख्यमंत्री को यह कहते हुए ट्रोल किया जाए कि वो काजू-बादाम के शौकीन हैं, भूखे हैं और ड्राई फ्रुट्स दिखाई देने पर उन्हें मलवे में दबे व्यक्तियों की फिक्र नहीं रह जाती, यह कहां तक उचित है? कुछ सिरफिरे तो यह तक कह सकते हैं कि आपदाग्रस्त क्षेत्र में जाकर मुख्यमंत्री बैठे क्यों रहे, उन्हें जेसीबी में बैठकर मलवा हटाना चाहिए था या फिर कटर हाथ में लेकर मलवे में मौजूद सरिया काटनी चाहिए थीं।

    साफ है कि व्यवस्था पर अंगुली उठाने के बजाए हर बार मुख्यमंत्री को निशाना बनाने का काम एक मिशन के तौर पर शुरू हो जाता है। दून से लेकर दिल्ली तक सिरफिरों के तार जुड़ जाते हैं। हैरानी की बात तो यह है कि इस तरह की छींटाकशी का काम वो लोग नहीं कर रहे जो पिछले कई दिनों से आपदाप्रभावित क्षेत्र में डटे हुए हैं और एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, आईटीबीपी व वायुसेना के जवानों की पल-पल की गतिविधियों के गवाह बने हुए हैं। सोशल मीडिया वॉरियर वो बने हुए हैं जो अभी तक देश की सीमा से लगे इस आपदाग्रस्त क्षेत्र में झांकने तक नहीं गए। समालोचना करो तो ऐसी करो जिससे जन समुदाय का लाभ हो और जिससे प्रभावितों को तत्काल राहत मिल सके।

    (uttarakhandkesari.in में)