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सियासत: वोट बैंक के लालच में सांस्कृतिक कार्यक्रमों का सहारा ले रहे हैं सियासी दल

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दिल्ली से दिलवर सिंह बिष्ट की रिपोर्ट 
दिल्ली में जैसे -जैसे ठंडे मौसम का पारा बढ़ता जा रहा है, वैसे वैसे हर सियासी पार्टी  चुनावी मौसम के हिसाब से अपनी अपनी तैयारियों में जुट गई है। उनकी सरगर्मियों से कमबख्त ठंड भी गायब सी होने लगी है। तमाम सियासी दल वोट बैंक मजबूत करने की चाहत में नये नये हथकंडे अपना रहे हैं।   इस बीच कुछ राजनीतिक पार्टियां प्रवासी गढ़वालियों के वोट की अहमियत को समझते हुए उनके बीच अपनी पैठ बनाने की कोशिश कर रही हैं। जहां उनकी जनसंख्या ज्यादा है, वहां -वंहा सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करा कर वहां रह रहे लोकगायकों व कलाकारों को साधने में लगे हैं। इससे जहां एक ओर भीड़ इकठ्ठा हो जाती है वहीं दूसरी ओर पार्टियों के नाम के साथ वोट की राजनीति भी हो जाती है।
राजनीतिक हलकों में चर्चाएं हैं कि संभवतः फरवरी में दिल्ली विधानसभा चुनाव की रणभेरी बजने वाली है। इसी हिसाब से हर पार्टी अपने-अपने स्तर पर राजनीति की गोटियां बिछाने में लग गई है।
 बता दें कि हर पार्टी अपने स्तर पर सर्वे करा रही है कि  किन -किन राज्यों के लोग किस किस इलाके में रहते हैं ताकि वहां वहां उन लोगों के बीच सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करा कर  उन्हें अपने समर्थन में एकजुट कर वोट सुनिश्चित किए जा सकें।  इसके लिए राजनीतिक दलों में सुपर बनने की होड़ मची है। इन दिनों दिल्ली में रह रहे गढ़वाली लोक गायकों व कलाकारों को सभी पार्टियां अपनी-अपनी पार्टी के लिये सांस्कृतिक कार्यक्रमों की रूप रेखा तैयार करने को कह रही हैं, जिससे दिल्ली में रह रहे गढ़वालियों की अच्छी खासी तादाद को वोट के रूप में अपने साथ लाया जा सके। अब ऊंट किस ओर करवट बदलेगा, यह तो समय बतायेगा लेकिन यह सत्य है कि अब   प्रवासी गढ़वाली पहले जैसे सीधे सादे पहाड़ी नहीं रहे कि कोई भी राजनीतिक दल उन्हें  आसानी से अपने झांसे में ले सके, अब वे अपना वजूद समझने लगे हैं।