Home Home बहादुरी के झंडे गाड़ने वाली गढ़वाल राइफल्स की थर्ड बटालियन

बहादुरी के झंडे गाड़ने वाली गढ़वाल राइफल्स की थर्ड बटालियन

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भारतीय सेना के महत्त्वपूर्ण अंग के रूप में गढ़वाल राइफल्स ने अपनी बहादुरी और पराक्रम को लेकर बड़ी प्रसिद्धि प्राप्त की है। इस की थर्ड बटालियन को आज 103 वर्ष पूरे हो रहे हैं। 20 अगस्त 1916 को स्थापित थर्ड बटालियन
गढ़वाल राइफल्स की सबसे बहादुर और पुरानी बटालियनों में से एक है। इसकी स्थापना लैंसडाउन गढ़वाल में ले. कर्नल जे.एम.टी. हॉग के नेतृत्व में हुई है। बटालियन ने सर्वप्रथम सन् 1918 में अफगान युद्ध में भाग लिया। इस युद्ध में बटालियन को ‘थिएटर ऑफ अफगान’ की उपाधि से नवाजा गया। तत्पश्चात बटालियन निरंतर अफ्रीकी देशों में शांति सेना के रूप में कार्य करती रही और हर मोर्चे पर सक्रिय रूप से अग्रणी भूमिका निभाती रही है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बटालियन ने गलावाद,वारेंटु,केरीन , मसाबा इरीटीरीया, अंबा लागी व ओबीसीनियाँ में इटली के सैनिकों से लोहा ले कर अन्य कई सम्मान प्राप्त किए हैं। सन 1940 में बटालियन ने गलाबाद के किले से इटली के सैनिकों को खदेड़ा और उस पर फतह हासिल करके भारतीय सेना का नाम रोशन किया है। 1942 में पश्चिमी अफ्रीकी देशों से भारत लौटने से पूर्व यह बटालियन मिस्र, इराक व साइप्रस में तैनात रही। यहां बटालियन का मुकाबला जर्मनी सेना से हुआ था। उत्तरी अफ्रीका में सेवा करने के बाद बटालियन को सीटों दि कास्टेलों में बहादुरी का सम्मान दिया गया। उसके बाद बटालियन स्वदेश लौट आई । सन 1947 में देश की आजादी के बाद कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को कश्मीर रियासत का भारत में विलय करने की घोषणा की। घोषणा के तुरन्त बाद ही पाकिस्तान के कबायलियों ने कश्मीर में घुसपैठ शुरू कर दी थी। उस समय तृतीय गढ़वाल राइफल 163 इन्फेंट्री ब्रिगेड के अधीन थी। तब महान थर्ड बटालियन दि गढ़वाल राइफल्स, जिसका नेतृत्व लेफ्टिनेंट कर्नल कमान सिंह पठानिया कर रहे थे, को कबायलियों से निपटने की जिम्मेदारी दी गई। बटालियन ने बिना देर किए 18 मई 1948 को प्रातः ही न्नेग्राम , कुपवाड़ा,ष्टिथवाल और चौकीवाल पर हमला करके कबायलियों को बुरी तरह से मार भगाया था। इस जंग में बटालियन को एक महावीर चक्र, अट्ठारह वीर चक्र, दो शौर्य चक्र और 19 मेंशन इन पदक प्राप्त हुए। उसके बाद बटालियन सन् 1953 में पुनः उत्तरी कोरिया में शांति सेना के रूप में कार्य के लिए चुनी गई। सन् 1955 में भारत लौटने के बाद बटालियन असम व नागालैंड के हनिकुंबला और घासपानी आदि क्षेत्रों में राष्ट्रविरोधी तत्वों को देश की मुख्यधारा से जोड़ने का कार्य करती रही। 1962 में कश्मीर लद्दाख के दुरवुक व चिशूल आदि स्थानों पर तैनात रही। 1965 में पाकिस्तान के साथ हुई जंग में थर्ड बटालियन ने अटारी से लाहौर कैंट की ओर बढ़ते हुए डोगराई,डोक्ची और भशीन आदि गांवों पर कब्जा कर लेने के बाद इच्छूगिल केनाल, जो लाहौर से मात्र 5 किलोमीटर की दूरी पर है, उसके होम बैंक पर
मोर्चा संभाला। 1966 में बटालियन पुन: मिजोरम में लूंगले, लुगासन और देमागिरी आदि जगहों पर देशद्रोही तत्वों से निपटने व उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने के लिए काम करती रही। सन् 1971 की जंग में महान थर्ड बटालियन ने शंकरगढ़ व सियालकोट सेक्टर में पाक फौज को बुरी तरह से मार भगाया। इस दौरान बटालियन ने पाकिस्तान के तकरीबन 50 गांवों पर कब्जा कर लिया था। तृतीय बटालियन, गढ़वाल राइफल्स भारतीय सेना की सबसे बहादुर बटालियनों में से एक है। चाहे जंग हो या अमन के हालात, चाहे मूसलाधार वर्षा हो या कड़ी गर्मी और सर्दी , पर्वत हो या मैदान .घुन्ध हो या घना कोहरा और चाहे अमन के दौरान शांति व्यवस्था बनाए रखने का आदेश, इस बटालियन को अपने हर कार्य में महारत हासिल है। देशसेवा के लक्ष्य के साथ मुझे भी सन् 1960 में इस बहादुर बटालियन मैं शामिल होने का सौभाग्य मिला। सन् 1962 , 1965 और 1971 की जंग में सक्रिय रूप से भाग लेने का अवसर मिला। इस महान थर्ड बटालियन की 103वीं वर्षगांठ के अवसर पर मैं बटालियन के सभी जांबाज शहीदों को, जिन्होंने देश सेवा करते द्दुये अपनी शहादतें दी हैं, सलाम करता हूं और उनके माता-पिता व सगे संबंधी, जिन्होंने अपने लाड़लों के असमय इस दुनिया से विदा हो जाने का ग़म और सदमा झेला है, उन्हें भी नतमस्तक होकर नमन करता हूँ। महान थर्ड बटालियन गढ़वाल राइफल्स की जय !! जय हिंद !!
– कै. बलवीर सिंह रावत
(पूर्व राज्य मंत्री)
सैनिक कल्याण परिषद, उत्तराखंड