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पहल: पलायन को रोकने के लिए स्वरोजगार की संभावनाओं पर विचार करना होगा

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दिलबर सिंह बिष्ट
रुद्रप्रयाग- पहाड़ के युवाओं का महानगरों के जाल व दुष्चक्र में फंस कर पलायन करना एक चिरकालिक समस्या बन गया है, जिसके सामाजिक व आर्थिक पहलू हैं। इस समस्या के समाधान के लिए सर्वप्रथम पलायन के मनोविज्ञान को समझना आवश्यक है। महानगरों की चकाचौंध व आधुनिकता के आकर्षण से वशीभूत पहाड़ का युवा महानगरों की ओर जाता है। महानगर का आकर्षण मृग-मरीचिका की भांति युवाओं को विलासितापूर्ण स्वर्णिम भविष्य का आभास देकर अपनी तरफ खींचता है जबकि वास्तविकता इसके एकदम विपरीत एवं कठोर होती है।
पलायनोन्मुख युवा अपने सरल स्वभाव, उच्च शिक्षा के अभाव तथा अनुभवहीनता के कारण सहज ही इस दुष्चक्र में फंस कर रह जाता है व समाज के भयवश रिवर्स माइग्रेशन भी नहीं कर पाता।

जिलाधिकारी रुद्रप्रयाग मंगेश घिल्डियाल का कहना है कि समय रहते पहाड़ के युवाओं को यह समझना होगा कि वे पहाड़ से महानगरों की ओर रुख करने से पहले स्वरोजगार की सम्भावनाओं का मूल्यांकन करने के पश्चात ही गांव से बाहर अपना कदम बढ़ायें अर्थात उच्च शिक्षा, तकनीकी ज्ञान व अच्छी नौकरी सुनिश्चित होने के बाद ही जाने का मन बनाएं।
महानगरों की ओर जाने का निर्णय करने से पूर्व अपने आप से कुछ प्रश्न अवश्य पूछें:
० क्या मैंने किसी अच्छी नौकरी या व्यवसाय हेतु आवश्यक दक्षता प्राप्त कर ली है?
० क्या संभावित वेतन से मेरे जीवन स्तर में वास्तव में सुधार होगा?
० क्या मैंने महानगरों में जीवन यापन हेतु होने वाले न्यूनतम खर्चों का अनुमान लगा लिया है?
० क्या मैंने प्रतिदिन कार्य करने के घंटों के बारे में जानकारी प्राप्त कर ली है?
० क्या मैंने स्वरोजगार व दासता पूर्ण रोजगार का तुलनात्मक विश्लेषण कर लिया है?
० क्या मैंने संभावित रोजगार के हानिकारक रसायनों व प्रदूषण से मुक्त होने की पुष्टि कर ली है?
० क्या नये परिवेश में रहते हुए पारिवारिक एवं सामाजिक दायित्व पूर्ण करना संभव होगा?
० क्या मैंने अपने गांव में स्वरोजगार की सभी संभावनाओं का मूल्यांकन कर लिया है?

वास्तविकता यह है कि पहाड़ का पलायनकर्ता अधिकांश युवा फैक्टरी अथवा होटल मालिकों की दासता को विवश है, जिनके द्वारा उनका मानसिक व शारीरिक शोषण किया जाता है जिसके एवज में न्यून मजदूरी दी जाती है, जिसमें भरण-पोषण भी मुश्किल से हो पाता है। इसकी अपेक्षा युवा स्वरोजगार के माध्यम से अपने जीवन की आर्थिकी को सशक्त करें व स्वाभिमान युक्त जीवन व्यतीत करें, साथ ही महानगरों की तंगी से भरे कुंठित जीवन के दुष्चक्र से बचें। दासता से बेहतर है कि अपने बंजर खेतों में मालिक की भांति कार्य कर पहाड़ के वीरान पड़े घरों को आबाद करें।
इसी उद्देश्य के दृष्टिगत जिलाधिकारी की पहल पर एक नयी अवधारणा के रूप  में यंग फार्मर स्कूल का संचालन रुद्रप्रयाग के पुराने विकास भवन में किया जा रहा है, जोकि युवाओं को स्थानीय स्तर पर ही रोजगार की संभावनाओं की विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराने के साथ ही महानगरों के दुष्चक्र से बचने में सहायक सिद्ध हो सकेगा।
यंग फार्मर स्कूल में रिवर्स माइग्रेशन उपरांत जनपद में ही स्वरोजगार कर रहे प्रगतिशील कृषकों द्वारा अपनी सफलता की कहानी सुनाकर प्रतिभागियों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। इन प्रगतिशील कृषकों द्वारा अपनी आय-व्यय व बचत का पूर्ण ब्यौरा गणना सहित बताया जा रहा है। वहीं दूसरी ओर जनपद से पलायन कर महानगरों में कार्यरत कुछ युवा कठिन जीवनयापन व चकाचौंध के पीछे की वास्तविकता से संबंधित अपने अनुभव साझा कर इस दुष्चक्र को समझाने का प्रयास कर रहे हैं।
यंग फार्मर स्कूल के विशेषज्ञों के अनुसार पहाड़ में स्वरोजगार की अपार सम्भावनाएं हैं। इच्छुक युवाओं को तकनीकी एवं वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने हेतु विभिन्न विभाग व संस्थाएं भी तत्पर रहती हैं। दृढ़ इच्छाशक्ति व परिश्रम के माध्यम से स्वरोजगार शुरू कर युवा अपनी आर्थिकी को सशक्त करने के साथ ही अन्य नागरिकों को भी रोजगार दे सकते हैैं।
जो युवा इस स्कूल में प्रशिक्षण ले रहे हैैं, उन्हें प्रशिक्षण पूरा होने के उपरांत सभी विभाग यथा कृषि, उद्यान, पशुपालन, मत्स्य, डेरी आदि द्वारा स्वरोजगार शुरू करने हेतु पूरी सहायता दी जाएगी। कृषि विभाग द्वारा फार्म मशीनरी, कृषि यंत्र, बीज आदि, उद्यान विभाग द्वारा पाली हाउस, फल सब्जी बीज, सिचाई टैंक, घेरबाड़, सहकारिता विभाग द्वारा व्याज रहित लोन, पशुपालन विभाग द्वारा दुग्ध उत्पादन के संबंध में हर संभव सहयोग किया जाएगा।