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पटाक्षेप: अयोध्या विवाद पर इंतजार खत्म, सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया फैसला

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 नयी दिल्ली– सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि केंद्र सरकार के ट्रस्ट के मैनेजमेंट के नियम बनाए. मन्दिर निर्माण के नियम बनाए. अंदर और बाहर का हिस्सा ट्रस्ट को दिया जाए. मुस्लिम पक्ष को 5 एकड़ की वैकल्पिक ज़मीन मिले. या तो केंद्र 1993 में अधिगृहित जमीन से दे या राज्य सरकार अयोध्या में ही कहीं दे. हम अनुच्छेद 142 के तहत मिली विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए मुस्लिम पक्ष को ज़मीन दे रहे हैं. सरकार ट्रस्ट में निर्मोही को भी उपयुक्त प्रतिनिधित्व देने पर विचार करे.

कोर्ट ने कहा है कि सुन्नी वक्फ बोर्ड को वैकल्पिक ज़मीन देना ज़रूरी है. केंद्र सरकार 3 महीने में ट्रस्ट बनाए.

निर्मोही अखाड़ा के प्रवक्ता प्रभात सिंह ने कहा सुप्रीम कोर्ट ने हमारे दावे को ख़ारिज किया है. इस पर हम क्या कह सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का सम्मान है. हमारी मांग है कि मंदिर बन. आम जनमानस की मांग है मंदिर बने. हम इसका सम्मान करते हैं.

   कोर्ट ने कहा है यात्रियों के वृतांत और पुरातात्विक सबूत हिंदुओं के हक में हैं. 6 दिसंबर 1992 को स्टेटस को का ऑर्डर होने के बावजूद ढांचा गिराया गया. लेकिन सुन्नी बोर्ड एडवर्स पोसेसन की दलील साबित करने में नाकाम रहा है. लेकिन 16 दिसंबर 1949 तक नमाज हुई. सूट 4 और 5 में हमें सन्तुलन बनाना होगा हाई कोर्ट ने 3 हिस्से किये. यह तार्किक नहीं था.

   कोर्ट ने कहा है कि फिर भी मुख्य गुंबद के नीचे गर्भगृह मानते थे. इसलिए रेलिंग के पास आकर पूजा करते थे. साल 1934 के दंगों के बाद मुसलमानों का वहां कब्ज़ा नहीं रहा. वह जगह पर अपना दावा साबित नहीं कर पाए हैं.

 कोर्ट ने कहा है कि अंग्रेज़ों ने दोनों हिस्से अलग रखने के लिए रेलिंग बनाई. 1856 से पहले हिन्दू भी अंदरूनी हिस्से में पूजा करते थे. रोकने पर बाहर चबूतरे की पूजा करने लगे.

कोर्ट ने कहा है कि हिंदुओं के वहां पर अधिकार की ब्रिटिश सरकार ने मान्यता दी. 1877 में उनके लिए एक और रास्ता खोला गया. अंदरूनी हिस्से में मुस्लिमों की नमाज बंद हो जाने का

   कोर्ट ने कहा है कि सिर्फ विवादित ढांचे के नीचे एक पुरानी रचना से हिंदू दावा माना नहीं जा सकता. मुसलमान दावा करते हैं कि मस्ज़िद बनने से साल 1949 तक लगातार नमाज पढ़ते थे, लेकिन 1856-57 तक ऐसा होने का कोई सबूत नहीं है.

कोर्ट ने कहा है कि हिन्दू अयोध्या को राम भगवान का जन्मस्थान मानते हैं. मुख्य गुंबद को ही जन्म की सही जगह मानते हैं. अयोध्या में राम का जन्म होने के दावे का किसी ने विरोध नहीं किया. विवादित जगह पर हिन्दू पूजा करते रहे थे. गवाहों के क्रॉस एक्जामिनेशन से हिन्दू दावा झूठा साबित नहीं हुआ. चबूतरा,भंडार, सीता रसोई से भी दावे की पुष्टि होती है. हिन्दू परिक्रमा भी किया करते थे. लेकिन टाइटल सिर्फ आस्था से साबित नहीं होता.

   सुप्रीम कोर्ट में फैसला पढ़ा जा रहा है. कोर्ट ने निर्मोही अखाड़े का दावा खारिज कर दिया है. निर्मोही अखाड़ा सेवादार भी नहीं है. रामलला को कोर्ट ने मुख्य पक्षकार माना है. यानी दो में से एक हिंदू पक्ष का दावा खारिज कर दिया है.   

कोर्ट ने कहा है कि सुन्नी वक्फ बोर्ड ने बहस में अपने दावे को बदला. पहले कुछ कहा, बाद मे नीचे मिली रचना को ईदगाह कहा. साफ है कि बाबरी मस्जिद खाली जमीन पर नहीं बना था. नीचे विशाल रचना थी. वह रचना इस्लामिक नहीं थी. वहां मिली कलाकृतियां भी इस्लामिक नहीं थी. ASI ने वहां 12वीं सदी की मंदिर बताई. विवादित ढांचे में पुरानी संरचना की चीज़ें इस्तेमाल हुईं. कसौटी का पत्थर, खंभा आदि देखा गया. कोर्ट ने कहा है कि निर्मोही अपना दावा साबित नहीं कर पाया है. निर्मोही सेवादार नहीं है. रामलला juristic person हैं. राम जन्मस्थान को यह दर्जा नहीं दे सकते. पुरातात्विक सबूतों की अनदेखी नहीं कर सकते. वह हाई कोर्ट के आदेश पर पूरी पारदर्शिता से हुआ. उसे खारिज करने की मांग गलत है.
कोर्ट ने कहा है कि कोर्ट हदीस की व्याख्या नहीं कर सकता. नमाज पढ़ने की जगह को मस्ज़िद मानने के हक को हम मना नहीं कर सकते. 1991 का प्लेसेस ऑफ वरशिप एक्ट धर्मस्थानों को बचाने की बात कहता है. एक्ट भारत की धर्मनिरपेक्षता की मिसाल है.
 जज ने कहा है कि कोर्ट को देखना है कि एक व्यक्ति की आस्था दूसरे का अधिकार न छीने. मस्ज़िद साल 1528 की बनी बताई जाती है, लेकिन कब बनी इससे फर्क नहीं पड़ता. दिसंबर को मूर्ति रखी गयी. जगह नजूल की ज़मीन है. लेकिन राज्य सरकार हाई कोर्ट में कह चुकी है कि वह ज़मीन पर दावा नहीं करना चाहती.

शिया वक्फ बोर्ड का दावा खारिज कर दिया गया है. सुप्रीम कोर्ट ने साल 1946 का फैसला बरकरार रखा है.

वरिष्ठ पत्रकार भूपेंद्र कंडारी के सौजन्य से