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उत्तराखंड: पंचायत चुनावों में भाजपा को मायूसी, कांग्रेस की जगी उम्मीद

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अल्मोड़ा । पंचायत चुनावों में जिला पंचायत सीटों पर परिणाम आने के बाद भाजपा खेमे में हताशा का माहौल है, जबकि कांग्रेस खेमा खुशी से झूम रहा है। हालांकि बीती पंचायत में भाजपा नेतृत्व 8 सीटों पर था। वर्तमान में यह आंकड़ा 14 के आसपास पहुंचा है। उधर निर्दलीय और अन्य संपर्क को जोड़कर कांग्रेस 21 के आसपास पहुंच गई है और मात्र 1 या 2 प्रत्याशियों के समर्थन से जिला पंचायत अध्यक्ष सीट पर अपने प्रत्याशी को बैठाने की जुगत कर रही है।हैरानी की बात है कि इस बार मोदी लहर के बाद भी भाजपा अपने घोषित प्रत्याशियों में  से इक्का दुक्का को ही जिताने में सफल हुई है। भाजपा के भीतर जबरदस्त गुटबाजी , जिलाध्यक्ष को लेकर चुनावों के पूर्व की खींचतान, विधायकों की मनमानी , भाई भतीजावाद आदि के कारण भाजपा को इस बार का मुंह देखना पड़ा है। भाजपा की गुटबाजी का खामियाजा स्वयं भाजपा के बड़े नेताओं को भी चुकाना पड़ा है ।विपरीत माहौल और हार का पूर्वानुमान लगाते हुए जहां भाजपा जिलाध्यक्ष ने नामांकन कराने के बाद अपना नामांकन तक वापस ले लिया, वहीं विधानसभा उपाध्यक्ष अपने भतीजे को चुनाव नहीं जिता पाए और भारी वोटों से उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा। कांग्रेस की सरकार के समय सभी को चौंकाकर ब्लाक प्रमुख बने भाजपा नेता सूरज सिराड़ी तो इस बार जिला पंचायत चुनाव में दौड़ में ही नहीं दिखाई दिये। अल्मोड़ा से सटी गोलना करड़िया सीट पर सूरज तीसरे स्थान पर रहे और राजनैतिक रूप से कमतर आंके जा रहे जीवन भंडारी ने उन्हें राजनीति सिखा दी। उधर चुनाव पूर्व ग्राम भ्रमण यात्रा व प्रभावशाली प्रत्याशियों के चयन के कारण कांग्रेस को इस चुनाव में बढ़त मिली है। भाजपा के शीर्ष नेताओं ने भी ठोस सांगठनिक क्रियाकलापों को नकारते हुए जिस प्रकार इस बार टिकटों का वितरण किया और अनेक स्थानों पर प्रत्याशी ही घोषित नहीं किया, उसका खामियाजा भी पार्टी को भुगतना पड़ा है। हालत यह थी कि सुनौली सीट पर उनका कोई कैडींडेट ही नहीं था। वहीं बल्टा सीट पर भी भाजपा ने किसी को सर्मथन नहीं दिया। इस सीट पर भाजपा के लोग भी कांग्रेस प्रत्याशी महेन्द्र सिंह बिष्ट के प्रचार के लिये दिन रात एक करते देखे गये।अधिकांश सीटों पर चर्चित, समाज से जुड़े और अच्छे व्यवहार वाले प्रत्याशियों के व्यक्तित्व को देखकर ही जनता ने मतदान किया है। हालांकि धन बल का भी इस बार काफी बोलबाला रहा है। अनेक सीटों पर प्रत्याशियों ने लाखों रुपए खर्च कर प्रभाव जमाया है। देखा जाए तो यह चुनाव भाजपा के लिए सबक सीखने वाला चुनाव है और पिथौरागढ़ से भी आए नकारात्मक परिणामों के बाद बड़ी समीक्षा की मांग करता है। यह चुनाव यह भी संदेश दे रहा है कि क्षेत्र के बड़े नेताओं भगत सिंह कोश्यारी के राजनीति से दूर होने और प्रकाश पंत के निधन के बाद इस क्षेत्र में नेतृत्व विहीन अराजकता भी भाजपा को खोखला कर सकती है। जिसका प्रभाव आने वाले विधानसभा चुनावों में दिखाई देगा। परिणाम आने के बाद भाजपा के पास अब दो ही विकल्प बचे हैं,  या तो वह चुपचाप विपक्ष में बैठे या फिर अल्मोड़ा जिला पंचायत में 15 से आगे की गिनती के लिए जोड़तोड़ करे। इधर, सूत्र बता रहे हैं कि भाजपा खेमे के अनेक लोग कांग्रेस के बड़े नेताओं के संपर्क में हैं और भाजपा का एक धड़ा कांग्रेस के प्रभाव डालने वाले नेताओं को अपने खेमे में लाने की जुगत भी कर रहा है। जोड़तोड़ और संख्या बल के आधार पर फिलहाल कांग्रेस ही भारी नजर आ रही है।भाजपा की दृष्टि से अल्मोड़ा का प्रदेश में रहा सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन।भाजपा द्वारा जिला पंचायत सीटों पर किए गए प्रदर्शन पर भाजपा खेमे में जहां निराशा है,  वहीं सांगठनिक दृष्टि से भाजपा नेता इसे अच्छा प्रदर्शन मान रहे हैं। प्रदेशवार जिलों में दिए गए टिकटों के आधार पर अल्मोड़ा जिला फिलहाल श्रेष्ठ प्रदर्शन में नजर आ रहा है। अल्मोड़ा में भाजपा ने 15 सीटों पर विजय दर्ज की। 6 स्थानों पर भाजपा बागी जिसमेंदोस्थानों पर सीट न घोषित करने पर भाजपा से संपर्क रखने वाले प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की है। इसके सापेक्ष बागेश्वर में भाजपा ने 19 में से मात्र 8 और नैनीताल में 27 में से 10, पिथौरागढ़ में 33 में से 15 और पौड़ी में 38 में से 10 तथा रुद्रप्रयाग में 18 में से मात्र 5 सीटों पर ही जीत दर्ज की है।