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बेहद ग़रीबी में जी रहा है पद्मश्री से सम्मानित एक संजीदा संगीतकार

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मुंबई- फिल्म इंडस्ट्री में अक्सर ऐसे किस्से सुनने को मिलते हैं, जिसमें कोई कलाकार गरीबी और गुमनामी की जिंदगी जी रहा होता है । हाल ही में फिर से एक ऐसा ही वाकया सामने आया है। इस बार मशहूर संगीत निर्देशक वनराज भाटिया को लेकर खबर आई है। वनराज भाटिया को 31 साल पहले सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशन का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला था । साथ ही 2012 में उन्हें पद्मश्री से नवाजा गया था । आज ये संगीतकार तंगहाली में दिन गुजार रहे हैं।उनके घुटनों में दर्द रहता है, जिसके चलते बिस्तर से उठकर चलना-फिरना मुश्किल है। सुनाई देना लगभग बंद हो गया है और याददाश्त भी जा चुकी है। न उनके बैंक अकाउंट में पैसे बचे हैं और न ही कमाने और गुजर-बसर करने का कोई साधन है। लगातार स्वास्थ्य खराब रहने की वजह से उनका संपर्क बाहरी दुनिया से कट चुका है और इन दिनों उन्हें मदद की सख्त जरूरत है। 92 साल के वनराज भाटिया के बैंक में एक भी पैसा नहीं बचा है ।

हाल ही में मुंबई मिरर को दिए इंटरव्यू में वनराज ने अपनी हालत के बारे में बात की । वनराज को सुनने में भी दिक्कत होती है साथ ही अब उनकी याददाश्त भी कमजोर हो रही है।वनराज ने मुंबई मिरर से बात करते हुए कहा, ‘मेरे पास बैंक में अब एक भी रुपया भी नहीं बचा हैं।’ घर में काम करने वाला नौकर ही उनका अकेला सहारा है । अब नौबत ये आ गई है कि वो अपने घर की कीमती क्रॉकरी और कुछ अन्य सामान बेचने को मजबूर हैं । वनराज के घर पर काम करने वाले नौकर ने एक न्यूजपेपर से बात करते हुए बताया कि लंबे समय से उनका इलाज नहीं चल रहा है । इस वजह से उनकी खराब सेहत के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता है । कभी पड़ोसी तो कभी किसी मददगार की बदौलत वह अपना जीवन यापन कर रहे हैं। वनराज ने श्याम बेनेगल की कई फिल्मों, जैसे अंकुर, भूमिका और टीवी सीरीज ‘यात्रा’ और ‘भारत एक खोज’ में संगीत दिया था। जीवन के इस पड़ाव पर वह अपनों से दूर हैं। अब उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है ।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, वनराज ने शादी नहीं की थी। उनकी एक बहन है, जो कनाडा में रहती है। मुंबई में भी उनके कुछ रिश्तेदार हैं, जो छोटी-मोटी आर्थिक मदद कर देते हैं। सुजीत कुमारी नाम की एक नौकरानी उनका ख्याल रख रही है। वह उनके घरेलू काम भी करती है। भाटिया ने एक बातचीत में बताया था कि उन्होंने अपना पैसा शेयर बाजार में लगाया था, जो कि साल 2000 के करीब मार्केट में डूब गया। इसी के चलते उनके पास कोई बचत नहीं है।

वनराज के पास डॉक्टर के पास जाने और दवाएं खरीदने तक के पैसे नहीं हैं। मुंबई मिरर से बातचीत में उनकी नौकरानी सुजीत ने उनकी कुछ ब्रिटिश क्रॉकरी दिखाईं। सुजीत की मानें तो गुजर बसर करने के लिए इन क्रॉकरीज को बेचा जा रहा है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि वनराज किराए के घर में रहते हैं, जिसका किराया कुछ सामाजिक संगठन और लोग मिलकर चुकाते हैं। सुजीत के मुताबिक, वनराज की पाप्सो नाम की एक पालतू बिल्ली थी। करीब 6 महीने पहले घर के बाहर एक कार के नीचे आने से उसकी मौत हो गई। तब से भाटिया एकदम टूट गए। वो खामोश रहने लगे। पाप्सो उन्हें इतनी प्रिय थी कि आज नींद में भी वे उसका नाम पुकारते हैं।

वनराज भाटिया ने 1988 में आई फिल्म ‘तमस’ के लिए सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का राष्ट्रीय पुरस्कार जीता था। इस फिल्म को गोविंद निहलानी ने डायरेक्ट किया था। ओम पुरी, दीपा साही, भीष्म साहनी और सुरेखा सीकरी की इसमें मुख्य भूमिका थी। 2012 में संगीत और कला में अहम योगदान के लिए भारत सरकार ने वनराज को पद्मश्री से सम्मानित किया था।1927 में मुंबई में जन्मे भाटिया लंदन की रॉयल एकेडमी ऑफ म्यूजिक के गोल्ड मैडलिस्ट हैं। वे दिल्ली यूनिवर्सिटी के वेस्टर्न म्यूजिक डिपार्टमेंट के इंचार्ज भी रह चुके हैं। उन्होंने हजारों विज्ञापनों के जिंगल्स, फिल्मों और टीवी धारावाहिकों में संगीत दिया है।

भाटिया ने डायरेक्टर श्याम बेनेगल की 9 फिल्मों ‘अंकुर’, ‘भूमिका’, ‘मंथन’, ‘जुनून’, ‘कलयुग’, ‘मंडी’, ‘त्रिकाल’, ‘सूरज का सातवां घोड़ा’ और ‘सरदारी बेगम’ में संगीत दिया। इसके अलावा ‘जाने भी दो यारो’ और ‘द्रोह काल’ जैसी अन्य फिल्मों में भी उनका संगीत सुना गया। उन्होंने सीरियल ‘भारत एक खोज’ के सांग ‘सृष्टि से पहले सत्य नहीं था’ में संगीत दिया था। उनके द्वारा संगीतबद्ध किए गए गाने ‘हम होंगे कामयाब’ (जाने भी दो यारो’ और ‘मारे गाम काथा पारे’ (मंथन) काफी पॉपुलर रहे हैं।