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मंगलवार से शुरू होगा पौराणिक बामन द्वादशी मेला

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 * भव्य और ऐतिहासिक होगा केदार घाटी के त्रियुगीनारायण का पौराणिक मेला

* नेगी दा के संग बिखरेंगे लोकसंस्कृति के अनेक रंग

 

सोनप्रयाग- केदार घाटी में हर साल आयोजित होने वाले पौराणिक बामन द्वादशी मेले की अलग ही पहचान है। स्थानीय युवाओं के सहयोग से आयोजित होने वाला ये मेला सामूहिक सहभागिता का बेहतरीन उदाहरण है। वामन द्वादशी मेला एवं जनहित विकास समिति त्रियुगीनारायण के सहयोग से बीते वर्षों की तरह इस बार भी वामन द्वादशी मेला का आयोजन होगा। मंगलवार 10 सितम्बर को ऐतिहासिक बामन द्वादशी मेला का आयोजन किया जायेगा। मेले के दौरान सांस्कृतिक कार्यक्रमों के तहत लोकसंस्कृति की झलक देखने को मिलेगी। 
9 सितम्बर यानी आज शाम को गढ़ गौरव नरेंद्र सिंह नेगी, लोक गायिका पूनम सती व लोक गायक सौरभ मैठाणी की ओर से सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया जाएगा। 10 सितंबर को लोक गायक रजनीकांत सेमवाल, केसर पंवार, नीशा रांगण, अनूप सेमवाल तथा 11 सितंबर को लोक गायक गजेंद्र राणा, हेमा नेगी करासी, कुलदीप कप्रवाण, विक्रम कप्रवाण के द्वारा साांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रस्तुतियां दी जाएंगी। मेले में इस बार विभिन्न क्षेत्रों में विशिष्ट कार्य करने वाली प्रतिभाओं को भी सम्मानित किया जाएगा। इससे पूर्व बतौर मेला  संरक्षक केदारनाथ के युवा  विधायक मनोज रावत ने हरियाली मेले का उद्घाटन किया। इस मौके पर पूर्व दर्जाधारी रणजीत सिंह रावत भी उपस्थित रहे।


— पौराणिक हरियाली मेला
वर्षों से चली आ रही परम्पराओं के तहत बामन द्वादशी मेले से पहले त्रिजुगीनारायण में पौराणिक हरियाली मेला भी आयोजित होता है। हरियाली मेले में गांव के सभी ग्रामीणों द्वारा अपनी घरों में जौ की हरियाली उगाई जाएगी जबकि मेले के दिन सभी लोग इस हरियाली को टोकरी में लेकर मंदिर पहुंचेंगे। मंदिर में पूजा अर्चना व परिक्रमा के बाद ग्रामीणों द्वारा हरियाली वामन भगवान को अर्पित की जाएगी। बाद में इसको प्रसाद के रूप में भक्तों में बांटा जाएगा। वर्षों से चली आ रही इस परम्परा को लेकर ग्रामीणों में बेहद उत्साह है। 
— निसंतान दंपत्ति रखेंगे उपवास
बरसों से निसंतान दंपत्ति दूर दूर से आकर यहां अपना पंजीकरण कराते हैं और उपवास रखते हैं। इस साल भी मेले के दौरान नौ सितम्बर को निसंतान दंपती संतान प्राप्ति के लिए यहां एकादशी उपवास करेंगे। गौरतलब है कि श्रीनगर के बैकुंठ चतुर्दशी मेले और मंडल के अनुसुया मंदिर में भी निसंतान दंपत्ति संतान प्राप्ति की कामना के लिए हर साल  उपवास रखते हैं।

— इसलिए मनाया जाता है वामन द्वादशी मेला

धर्म ग्रंथों के अनुसार इसी शुभ तिथि को श्रवण नक्षत्र के अभिजित मुहूर्त में भगवान श्री विष्णु ने एक अन्य रूप भगवान वामन का अवतार लिया था। क्योंकि इस दिन विशेष रूप से श्रीहरि के अवतार ‘वामन’ की पूजा की जाती है। वामन देव भगवान विष्णु के दस अवतारों में से एक अवतार हैं, जिनकी पूजा करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इस दिन व्रत एवं पूजन करने से भगवान वामन प्रसन्न होते हैं और भक्तों की समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करते हैं। बैकुंठ धाम बद्रीनाथ के अलावा त्रिजुगीनारायण में भी वामन द्वादशी के दिन भगवान विष्णु के अवतार ‘वामन’ की पूजा होती है। जिसके साक्षी हजारों लोग बनते हैं।
— त्रिजुगीनारायण मंदिर की ये है धार्मिक मान्यता 
मान्यताओं के अनुसार रुद्रप्रयाग जनपद के मैखंडा पट्टी में मंदाकिनी क्षेत्र के मंदाकिनी सोन और गंगा के मिलन स्थल त्रिजुगीनारायण मंदिर में शिवरात्रि के पवित्र दिन भगवान शिव ने माता पार्वती से विवाह किया था। भगवान शिव के विवाह को लेकर कई तरह की कथाएं अलग-अलग धर्म ग्रंथों में प्रचलित हैं। माता पार्वती और भगवान शिव के विवाह का प्रमाण है यहां जलने वाली अग्नि की ज्योति जो त्रेतायुग से निरंतर जल रही है। कहते हैं कि भगवान शिव ने माता पार्वती से इसी ज्योति के सामने विवाह के फेरे लिए थे। तब से अब तक यहां अनेकों जोड़े विवाह बंधन में बंधते हैं। लोगों का मानना है कि यहां शादी करने से दांपत्य जीवन सुख से व्यतीत होता है। इससे सौभाग्य की उम्र लंबी रहती है और जीवनसाथी के साथ बेहतर तालमेल बना रहता है। इस क्षेत्र का नाम त्रियुगीनारायण को लेकर धार्मिक मान्यता है कि यहां पर भगवान नारायण, लक्ष्मी और सरस्वती एक साथ विराजमान हैं। 

— मंदिर परिसर में मौजूद है कुंड

इस मंदिर में स्थित कुंड के बारे में मान्यता है कि विवाह संस्कार कराने से पूर्व भगवान विष्णु ने इसी कुंड में स्नान किया था। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार माता-पार्वती और भगवान शिव के विवाह में भगवान विष्णु ने माता पार्वती के भाई की भूमिका निभाई थी और भाई द्वारा बहन की शादी में की जाने वाली सभी रस्में भगवान विष्णु ने ही पूरी की थीं। 

— त्रेतायुग की जलती धूनी
इस मंदिर में स्थित हवन कुंड में हर समय अग्नि जलती रहती है। इस अखंड ज्योति के बारे में कहा जाता है कि यह उसी समय से जल रही जब शिव-पार्वती के फेरे हुए थे। इस मंदिर में दर्शन करने आनेवाले भक्त इस कुंड की राख (भस्म) को अपने साथ प्रसाद के रूप में घर ले जाते हैं और शुभ कार्यों के दौरान इसका टीका लगाते हैं।

— शिव पार्वती के विवाह में सम्मिलित हुये थे ऋषि-मुनि
त्रियुगीनारायण हिमावत की राजधानी थी। यहां शिव पार्वती के विवाह  समारोह में सभी संत-मुनियों ने भाग लिया था। विवाह स्थल के नियत स्थान को ब्रह्म शिला कहा जाता है जो कि मंदिर के ठीक सामने स्थित है। विवाह से पहले सभी देवताओं ने यहां स्नान भी किया और इसलिए यहां तीन कुंड बने हैं, जिन्हें रुद्रकुंड, विष्णु कुंड और ब्रह्मा कुंड कहते हैं। इन तीनों कुंड में जल सरस्वती कुंड से आता है। सरस्वती कुंड का निर्माण विष्णु की नासिका से हुआ था और इसलिए ऐसी मान्यता है कि इन कुंड में स्नान से संतानहीनता से मुक्ति मिल जाती है। 
अगर आपके पास भी समय हो तो जरूर आइयेगा केदार घाटी के पौराणिक बामन द्वादशी मेले का हिस्सा बनने ऋषिकेश – गौरीकुंड मार्ग पर रूद्रप्रयाग से लगभग 80 किमी की दूरी पर स्थित है ये मंदिर जबकि सोनप्रयाग से 12 किमी की दूरी पर स्थित है।