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उत्तराखंड में शराब के सिर्फ ठेके बंद हैं, शराब नहीं

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देहरादून। इसे आबकारी विभाग का कमाल ही कहा जा सकता है कि उत्तराखंड में भले ही शराब के ठेके बंद हो जाएं लेकिन शराब कभी बंद नहीं होती। शराब के शौकीनों के लिए जो काम सरकार नहीं कर सकती, उसे तस्कर आसानी से कर लेते हैं। यही वजह है कि पियक्कड़ों को वहां भी शराब सुलभ हो जाती है जहां पर शराब के सरकारी ठेके बंद पड़े हैं। राज्य में चालू वित्त वर्ष में कई शहरों में बड़ी खपत वाले शराब के ठेके बंद पड़े हैं। इनमें मैदानी क्षेत्रों के साथ ही पहाड़ी क्षेत्रों के ऐसे शहर भी शामिल हैं, जहां शराब का केवल एक-एक ठेका ही था। ठेके बंद होने से ऐसे स्थानों पर शराब की पूर्ति कहां से हो रही है। आबकारी विभाग भी इसका जवाब नहीं ढूंढ़ पा रहा है।

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राज्य में चालू वित्त वर्ष में करीब 130 देशी-विदेशी शराब के ठेके उठ नहीं पाए हैं। इन ठेकों से विभाग की आमदनी तो करीब 250 करोड़ रुपये कम हो गई है। बंद ठेकों वाले स्थानों पर शराब की खपत कहां से हो रही है, यह बड़ा सवाल है। ऐसे स्थानों पर कच्ची या तस्करी की शराब पहुंचने की संभावना बढ़ गई है। बीते वर्ष हरिद्वार जिले के रुडक़ी क्षेत्र में जहरीली शराब पीने से बड़ी संख्या में लोगों की जान चली गई थी। इस बार जिन क्षेत्रों में शराब के ठेके बंद हैं वहां ऐसी स्थिति से बचने के लिए शराब तस्करी रोकना आबकारी विभाग के बड़ी चुनौती है।

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इस साल हरिद्वार और उधमसिंहनगर के सबसे ज्यादा ठेके बंद हैं। वहीं गढ़वाल के पहाड़ी जिलों की बात की जाए तो बड़ी खपत वाले श्रीनगर, कोटद्वार, पौड़ी समेत कई बड़े ठेके बंद हैं। राज्य में चालू वित्त वर्ष में उठने से रह गए शराब के ठेकों को दोबारा उठाने के लिए टेंडर निकाले गए थे। टेंडर में इन्हें उठाने के लिए आबकारी मुख्यालय से जिलावार अफसरों की ड्यूटी लगाई गई थी। बावजूद इसके कई अफसरों ने ग्राउंड स्तर पर जाकर इसे गंभीरता से नहीं लिया। इस वजह से बड़े ठेके अभी बंद पड़े हैं। उधर, आबकारी आयुक्त सुशील कुमार का कहना है कि बड़ी संख्या में इस बार ठेके उठ नहीं पाए। जिन क्षेत्रों के यह शराब ठेके हैं, वहां जिले की आबकारी टीम के साथ ही मंडलीय टीम को भी तस्करी रोकने के सख्त निर्देश दिए गए हैं। इसकी नियमित मानिटरिंग भी हो रही है। गड़बड़ी मिली तो सख्त कार्रवाई होगी।