Home देश किसान आंदोलन: उधर वार्ता की पेशकश, इधर बगावती तेवर बरकरार

किसान आंदोलन: उधर वार्ता की पेशकश, इधर बगावती तेवर बरकरार

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संवाददाता
नयी दिल्ली, 28 दिसंबर। केंद्र सरकार द्वारा लाए गए तीन नए कृषि सुधार कानूनों के खिलाफ किसानों का आंदोलन थमता नजर नहीं आ रहा है। पंजाब और हरियाणा के किसानों की शुरुआत के बाद उत्तराखंड और राजस्थान समेत कई अन्य राज्यों के किसानों की भागीदारी इस आंदोलन में बढ़ती जा रही है। इस बीच आंदोलनकारी संयुक्त किसान मोर्चा ने वार्ता का प्रस्ताव देकर भले ही फिर से केंद्र सरकार के पाले में गेंद डाल दी है लेकिन सरकार की सशर्त वार्ता की जिद और किसानों के विरोध को जारी रखने के जुनून से पूरा मामला खटाई में पड़ता दिख रहा है। अटल जयंती और क्रिसमस केक के सहारे दोनों पक्षों के बीच की तल्खी को दूर करने की सरकार की कोशिश थोड़ा परवान तो चढ़ी लेकिन सशर्त वार्ता की पेशकश से सारा मामला ही  बिगड़ गया है।
गौरतलब है कि आंदोलन के सूत्रधार कहे जाने वाले संयुक्त किसान मोर्चा ने सरकार को 29 दिसंबर को 11 बजे बातचीत का प्रस्ताव भेजा है। सरकार बातचीत चाहती है, इसलिए उसे हामी भरने में संकोच न होगा। फिर दोनों पक्ष वार्ता की मेज पर जुटेंगे। आंदोलकारियों का चार एजेंडा है। नए कानूनों की वापसी की प्रक्रिया, न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी की प्रक्रिया, पराली और बिजली 2020 अधिनियम में राहत पर चर्चा। पराली और बिजली 2020 पर तो सरकार पहले ही नरमी के संकेत दे चुकी है, लेकिन तीन कानूनों की वापसी के सवाल पर उसकी ओर से लगातार ‘नहीं’ के ही संकेत मिल रहे हैं । न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सरकार लिखित गारंटी को भी तैयार है। अब तर्क और दलीलों पर स्थिति निर्भर करेगी। ऐसे में दोनों पक्षों के बीच संवाद की प्रक्रिया  से फिर डेडलॉक का अंदेशा बरकरार है।
ताज़ा परिदृश्य यह है कि संयुक्त किसान मोर्चा ने वार्ता की ‘डेडलाइन’ महज 24 घंटे रखी है। 29 दिसंबर को बातचीत और 30 दिसंबर को कुंडली-मानेसर-पलवल (केएमपी) हाई-वे पर ट्रैक्टर-ट्रॉली जाम का एलान। वार्ता और विरोध की साथ-साथ घोषणा से किसानों की मंशा साफ है। डेडलॉक से डॉयलॉग के लिए कड़वाहट दूर हो सकती है लेकिन मुद्दे के हल की पहल में तनातनी का माहौल  बरकरार है। दिल्ली में इस आंदोलन को महीना भर हो चुका है। पांच दौर की बातचीत और अमित शाह के साथ चर्चा से जिन मुद्दों पर सहमति नहीं बनी, उन पर महज 24 घंटे में अब एक दौर की बातचीत से नतीजे की उम्मीद बेमानी है। किसान नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर दुष्प्रचार का आरोप मढ़ा। सियासी विरोध के आरोपों को खारिज किया।
‘डेडलाइन’ महज दबाव की रणनीति का हिस्सा नहीं। तीन दिन से टोल फ्री अभियान में किसानों जमावड़ा बढ़ता जा रहा है। सिंघु-टिकरी बॉर्डर से शाहजहांपुर-राजस्थान मार्ग पर हजारों किसान जुटे हैं। एक निजी कंपनी के मोबाइल टॉवर के बिजली कनेक्शन काटे जा रहे हैं। कनेक्टिविटी प्रभावित हो रही है। राजस्थान हाई वे पर किसानों के इसी जमावड़े के बीच राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के हनुमान बेनीवाल ने एनडीए से नाता तोड़ने की घोषणा की है।
पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने कमेटी और सरकार ने डेलिगेशन पर जोर दिया था। हालांकि 29 दिसंबर को होने वाली वार्ता में सभी 40 किसान संगठनों के प्रतिनिधि शामिल होंगे। सरकार की ओर से इस पर आपत्ति भी नहीं होगी क्योंकि सरकार ने ही पत्र में इन 40 किसान संगठनों का जिक्र किया है। 35-40 प्रतिनिधि पहली वार्ता से ही हिस्सा रहे हैं। संयुक्त किसान मोर्चा का मानना है कि सात सदस्यों ने राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन की शुरुआत की थी लेकिन धीरे-धीरे देश के अन्य किसान संगठन जुटते गए। मोर्चा  का कहना है कि पहले दिन से जिन 40 शिष्टमंडल से बात हुई है, उन्हीं के साथ फिर वार्ता होगी। मोर्चा अकेले पांच-सात सदस्यीय कमेटी से वार्ता के पक्ष में  नहीं।
उधर, आंदोलनकारी किसानों ने दिल्ली-एनसीआरवासियों को नया साल सेलिब्रेट करने का न्योता दिया है। दूसरी ओर 30 दिसंबर से केएमपी हाईवे जाम का अल्टीमेटम भी। पिछले एक महीने से एनसीआर की सीमाओं पर आवाजाही प्रभावित है। नौकरीपेशा जूझ रहे हैं। दिल्ली से सटी हरियाणा, राजस्थान, यूपी की सीमाएं जाम हैं। ऐसे में यदि वार्ता खुले मन से नहीं की जाती, तो मुसीबत बढ़ेगी। लोगों ने लॉकडाउन और कोरोना संकट के चलते पहले ही बंद झेला है। अब इस आंदोलन के चलते फिर रेलगाड़ियां बेपटरी हैं। आर्थिक मोर्चे पर चुनौतियां हैं। आंकड़े रोजाना के नुकसान दर्शा रहे हैं। लोगों को कोरोना वैक्सीन का लाभ पहुंचाना है। ऐसे में किसान संगठनों के साथ-साथ सरकार से उम्मीद की जानी चाहिए कि दोनों थोड़ी नरमी बरतें। खुले मन से समाधान के लिए वार्ता हो। हल निकले तभी ‘सेलिब्रेशन’संभव है।