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बिहार का रण -6: ‘ग्रैंड वोटकटवा फ्रंट’ भी खिला सकता है गुल

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श्याम सिंह रावत की फेसबुक पोस्ट

बिहार में प्रथम चरण के मतदान के बाद वहां से जो खबरें आ रही हैं, उसके मुताबिक चुनावी तस्वीर अब साफ होने लगी है। नेता जो बिहार के मतदाताओं को उज्ज्वल भविष्य के सपने दिखा रहे थे वे अपने ही ‘वादों’ की गिरफ्त में फंस चुके हैं। सोशल मीडिया पर लोग अब नेताओं को उनके पुराने वादों की याद दिला रहे हैं।

महागठबंधन के नेता तेजस्वी ने रोजगार के सवाल को बहस के केंद्र में ला दिया है। बिहार के युवक भी यही चाहते हैं। उन्हें उनका भविष्य दिख रहा है। बिहार की राजनीति में जुमलों की बात बहुत हुई, अब जमीनी हक़ीकत पर बहस चल रही है। सुशासन बाबू यानी नीतीश कुमार को लोग अब ‘पलटू चाचा’ कह रहे हैं। अपनी इस छवि को बनाने के लिए उन्हें काफी मेहनत करनी पड़ी है और यही छवि उनकी विश्वसनीयता पर सवाल भी खड़ा कर रही है।

 

 

राजनीति हो या व्यक्तिगत जीवन जब कोई व्यक्ति अपनी विश्वसनीयता खो बैठता है तो उसका महत्व घट जाता है। “वादे हैं, वादों का क्या” कहना आसान है लेकिन ये जुमले ही पतन की गाथा लिखते हैं। अब वादों के चक्रव्यूह में फंसने को मतदाता तैयार नहीं हैं। लाॅकडाउन से लोगों को अपनी नौकरी गंवानी पड़ी है। व्यवसाय भी चौपट हो चुका है। ऊपर से महंगाई ने उनकी कमर तोड़ दी है। भविष्य के सुनहरे सपने की बात छोड़िए, बल्कि वर्तमान ही उनके सामने मुंह बाए खड़ा है और नेता अपने चुनावी प्रचार-प्रसार के लिए पानी की तरह रुपये बहा रहे हैं।

बिहार के रण में असदुद्दीन ओवैसी और उपेंद्र कुशवाहा ने जो गठबंधन बनाया है, उसका नाम ‘ग्रैंड डेमोक्रेटिक सैक्युलर फ्रंट’ दिया गया है लेकिन यह गठबंधन अब ‘ग्रैंड वोटकटवा फ्रंट’ में तब्दील हो गया है। इस फ्रंट के मुख्यमंत्री पद का चेहरा कुशवाहा हैं। मुकेश साहनी की पार्टी वीआइपी भी अपना वजूद चुनावी आंधी में खोती नज़र आ रही है। हम, जाप की कोई औकात नहीं है। कभी बिहार की राजनीति के केंद्र में आ गए जीतनराम मांझी अकेले पड़ गए हैं और पप्पू यादव चुके हुए मोहरा हैं।

बिहार विधानसभा की 20-25 सीटें ऐसी हैं, जिनमें जातीय समीकरण के आधार पर ‘वोटकटवा’ बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। जातीय गोलबंदी के आधार पर वे चुनावी गणित का पासा पलटने की हैसियत तो रखते ही हैं। इस सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता है और यही उनका उद्देश्य भी है। लोक जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष चिराग पासवान भी अंतत: वोटकटवा ही साबित होंगे। अपनी सभाओं में वह सुशासन बाबू को वोट न देने की अपील कर रहे हैं, जबकि एनडीए के मुख्यमंत्री पद के चेहरा नीतीश कुमार हैं और चिराग भी एनडीए के ही सहयोगी हैं। ऐसा करके वे किसको मजबूत कर रहे हैं? बिहार की राजनीति में चिराग ‘किंगमेकर’ बनने का सपना देख रहे हैं। यदि किसी गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला तो उसके बाद जो राजनीतिक खेल शुरू होगा, उसी की तैयारी में कुछ नेता अपनी शतरंज की गोटियां बिछाए हैं।

राज्यसभा की दस सीटों के चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश की राजनीति में बसपा के 5 विधायकों ने जिस तरह से अपना पाला बदला है, उसी से मायावती की ‘बिहार राजनीति’ का भी खुलासा हो जाता है। बिहार में बसपा का कोई जनाधार नहीं है, फिर भी वह ओवैसी के साथ गठबंधन करके मुस्लिम व दलित मतदाताओं को भरमाने की रणनीति पर काम कर रही हैं। एक तरफ बसपा एनडीए के खिलाफ है और दूसरी तरफ पर्दे के पीछे से उनकी मदद भी कर रही है। ओवैसी ने बिहार में गठबंधन बनाने के बाद जदयू-बीजेपी और राजद-कांग्रेस दोनों गठबंधनों की आलोचना की है।

बिहार के चुनावी संग्राम में कूदे महारथियों की बाडी-लैंग्वेज को यदि आप ध्यान से देखें तो बहुत कुछ समझा जा सकता है। पीएम मोदी, सीएम नीतीश, महागठबंधन के नेता तेजस्वी और लोजपा के चिराग की भाव-भंगिमाओं को पढ़ने की कोशिश करिए तो चुनावी तस्वीर की कहानी समझी जा सकती है। जब किसी बात को आप कहना नहीं चाहते हैं, तब आपका चेहरा व हाव-भाव बहुत कुछ बता देता है। बिहार की राजनीति में कुछ नेताओं का ‘अहंकार व डीएनए’ की राजनीति उनका पीछा कर रही है, जिसका फैसला 10 नवम्बर को हो जाएगा। तब तक इंतजार करने के अलावा फिलहाल दूसरा कोई विकल्प नहीं है।

पुनश्च : बिहार में महागठबंधन की चुनावी सभा की एक तस्वीर..! भीड़ का उत्साह बहुत कुछ बयान कर दे रहा है।

(साभार—Suresh Pratap Singh)