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खरी बात: पैदल घर लौट रहे हैं बेबस मजदूर, पैर के छालों से बह रहा है राष्ट्रवाद !

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नवीन दुबे, एडवोकेट
जब यह लेख लिख रहा हूँ तब मेरी कलम से स्याही नहींं बल्कि वेदना के आँसू निकल रहे हैंं। वह वेदना जो मजदूरों पर प्रतिदिन आ रही खबरों से असहनीय हो गई है। औरंगाबाद में मजदूर ट्रेन से कट कर मारे गए, लखनऊ में साइकिल से जाते दम्पति की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई और उनका  बच्चा अनाथ हो गया। ऐसी अनगिनत घटनाएं एक लेख में समाहित करना सर्वथा असम्भव है।
यह दशा देश के निर्माणकर्ता मजदूर की है। मजदूर वह वर्ग है, जो तमाम दुःख मुसबीत को झेल कर भी राष्ट्रहित में अपना जीवन दे देता है। किंतु आज जब समाज और सरकार दोनोंं की ओर वह देखता है तो उसे तिरस्कार ही मिलता है।
वह हजारों किलोमीटर पैदल चल रहा है। कुछ साईकिल से ही हजारों किलोमीटर की यात्रा कर रहे हैंं। इन यात्राओं के अनेक दुःखद पहलू भी सामने आ रहे हैंं, जो किसी भी मानव हृदय को झंझोर सकते हैंं। देश में जब राष्ट्रवाद की बात होती है तो वह राष्ट्रवाद पूरे देश को एक रखने की बात करता है। सबको मिलकर देश के प्रति समर्पित रखने की भावना का विकास करता है।
लेकिन इस कोरोना काल ने राष्ट्रवाद को क्षेत्रवाद में बदल दिया है। मजदूरों की हजारों किलोमीटर की यात्रा में उनके पैरोंं की बिवाइयों से राष्ट्रवाद का खून बनकर बाहर बह रहा है। मजदूर से बड़ा राष्ट्रवादी मिलना मुश्किल है क्योंकि वह देश के किसी भी कोने में जाए, वह उसे अपना ही घर समझता है। उसके लिए राज्यों की सीमाएं कोई मतलब नहींं रखती हैंं। किंतु इस दौर में समाज और सरकार दोनोंं ने उसे पराया कर दिया है।
केंद्र से लेकर राज्य सरकारें तक कसमें खाती हैं कि वो मजदूरों और गरीबों की मसीहा हैं। लॉकडाउन में फंसे मजदूरों के लिए रोज नए ऐलान होते हैं। कभी खाते में पैसे, कभी खाना देंगे, फिर ट्रेन चलाने का ऐलान, फिर मुफ्त यात्रा की बात, लेकिन जमीनी सच्चाई ये है कि मजदूर आज भी परेशान हैं।

ट्रेनों में एक अदद सीट के लिए उन्हें जंग लड़नी पड़ रही है। रजिस्ट्रेशन, मेडिकल, टिकट, बसों से सफर करने वालों की भी मुसीबतें हैं। नतीजा ये है कि कहीं-कहीं मजदूरों की बेबसी गुस्सा बनकर फूट रही है। सरकार ने खुद के लिए भी ये बचाव का रास्ता बना लिया। जैसे ये हमदर्दी का मामला है, जिम्मेदारी का नहीं। इस बात पर विमर्श तब अधिक तेज हुआ जब विदेशों से बिना किराया लिए स्वदेशी लोगोंं को भारत लाया गया। यह बात समाज को सीधे अमीर और गरीब में बांंट रही है। सरकार के दोहरे मापदंडों पर सवाल उठा रही है ?

हाल ही में उत्तरप्रदेश सरकार का मजूदर कानूनों में छूट देना, एक बड़ा अभिशाप बनके मजदूरों के सामने आया है। अब उद्योगपति मजदूरों का खून चूसने के लिए स्वतंत्र हो गए हैंं। राष्ट्रवाद मजदूरों के खून और मौतों के साथ निरर्थक हो गया है। जिस देश में सबसे कमजोर वर्गों मजदूर,किसान की अनदेखी हो, वह देश सदैव आन्तरिक रूप से कमजोर रहेगा। दुर्भाग्य की बात यह है कि अब भी भारतीय मीडिया के  पास इतना समय है कि वह पाकिस्तान से कैसे भारत श्रेष्ठ है, यह दिखाने में व्यस्त है। अब चश्मा बदलने की जरूरत है क्योंकि इतिहास हमको कभी माफ नहींं करेगा।
दुःख की बात यह है कि सरकार के लिए सिर्फ कानूनों का पालन कराने भर से मजदूरों का भला हो जाता है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अधिनियम (2005), अंतरराज्यीय प्रवासी श्रमिक अधिनियम (1979) और स्ट्रीट वेंडर अधिनियम (2014), संविधान का आर्टिकल-21 समेत कई कई कानून हैं जो यह आदेश देते हैं कि श्रमिक पूर्ण और समय पर मजदूरी के भुगतान के हकदार हैं। विस्थापन भत्ता, यात्रा के दौरान मजदूरी के भुगतान सहित भत्ता भी दिलाया जाना चाहिए था। इन कानूनों का अनुपालन सुनिश्चित करना सरकार की ही जिम्मेदारी है।

इस कहानी से झांकते नैतिक पतन, राजनीतिक उदासीनता तथा बात को गोल घुमाकर मनचाहा अर्थ देने की कवायद को अपने इतिहास में दर्ज करते हुए हमारे भावी इतिहासकार लिखेंंगे कि इस वक्त राज्य सरकारें नई-नई तरकीब ईजाद कर रही थीं ताकि मजदूरों को बंधक बनाकर रखा जा सके, विपक्षी दल अपने प्रमुख की चमत्कार-शक्ति की अराधना में व्यस्त थे और सत्ताधारी पार्टी ऐन इसी वक्त खबरों को अजब-गजब रंग देकर देश की एक मनभावन तस्वीर बनाकर दर्शक बने नागरिकों के आगे परोस रही थी। हमारा इतिहासकार दर्ज करेगा कि इस प्रकरण में तथ्य इतने साफ और एकदम से आंखों के आगे थे कि आप किसी भ्रम में पड़ना चाहें तो भी तथ्यों के आगे आपकी एक ना चले। और, हमारा भावी इतिहासकार सवाल करेगा कि क्या हम-आपने अपनी आंखों पर कोई पट्टी बांध रखी थी ताकि लॉकडाउन की हमारी शांति में कोई खलल ना पड़े !