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हाईकोर्ट: CJM देहरादून को पुलिस FR केस दो माह में  निस्तारित करने का निर्देश, अधिवक्ता राजेश सूरी की संदिग्ध मौत का है मामला

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संंवाददाता
नैनीताल, 26 मार्च।

उत्तराखंड  हाईकोर्ट ने अधिवक्ता राजेश सूरी की हत्या के मामले पर सुनवाई करते हुए सीजेएम देहरादून को निर्देश दिए हैं कि पुलिस ने इस केस में जो एफआर लगाई है, उसकी नोटिस की प्रति याचिकर्ता को दें और दो माह के भीतर मामले को निस्तारित कर उसकी रिपोर्ट  हाई कोर्ट में पेश करें। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायधीश आरएस चौहान व न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खण्डपीठ में हुई। सुनवाई के दौरान मृतक सूरी की बहिन रीता सूरी ने कोर्ट को बताया कि इस घटना को घटित हुए छः साल हो गए परन्तु अभी तक पुलिस मामले की जांच  नहीं कर पाई। वह इस केस को 2014 से लड़ रही है। याचिकाकर्ता द्वारा कोर्ट को अवगत कराया गया कि उनको जो पुलिस प्रोटेक्टशन दी गयी है, उसमें भी पुलिस विभाग द्वारा लापरवाही की जा रही है जिससे उनको व उनके भाई राज सूरी को जान का खतरा पैदा होने लगा है। पुलिस विभाग दिन में तो उनकी शुरक्षा हेतु गनर  भेजती है परंतु रात को होमगार्ड भेज देती है जिससे उनको जानमाल का खतरा ज्यादा उत्पन्न हो रहा  है। इसलिए उनकी सुरक्षा बढ़ाई जाए। याचिकाकर्ता ने इस केस में जांच कर रहे पुलिस पर भी सवाल खड़ा किया। उनके द्वारा कोर्ट के सम्मुख यह भी तथ्य लाया गया कि जो एफआर पुलिस द्वारा पेश की गई, उसकी प्रति उनको नहीं दी गयी, जबकि पुलिस दो बार इस केस में  एफआर लगा चुकी है। पुलिस भू माफियाओं के साथ मिलकर काम कर रही है।
मामले के अनुसार देहरादून निवासी  अधिवक्ता राजेश सूरी की बहन रीता सूरी ने याचिका दायर कर कहा है कि अधिवक्ता राजेश सूरी की हत्या 30 नवम्बर 2014 को हुई थी, जब राजेश सूरी नैनीताल हाईकोर्ट से घोटालों से सम्बंधित केसों की पैरवी करके  ट्रेन से  देहरादून वापस आ रहे थे। तब उनको  जहर देकर ट्रेन में ही मार दिया गया था  और राजेश की सभी महत्वपूर्ण फाइलें ट्रेन से ही गायब हो गई थीं। केवल कपड़ों से भरा बैग मिला था ।

राजेश की बहन रीता सूरी का कहना है कि देहरादून के कई भ्रष्टाचार के मामलों में राजेश ने घोटाले उजागर किए थे। उनमें से एक बलवीर रोड में जज क्वाटर घोटाला था, जिसमें भगीरथ कालोनी बनी है। उसके फर्जी कागजात बनाकर बेच दिया गया था। जिस पर 2003 में तत्कालीन जिलाधिकारी राधा रतूड़ी ने सम्पत्ति को फर्जी पाते हुए कुर्क करने के आदेश देने के साथ ही किसी भी तरह के निर्माण पर रोक लगा दी थी। ऐसे ही मामलों की पैरवी हेतु वे अक्सर हाइकोर्ट जाते थे।